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बीते शनिवार एक कार्यक्रम के दौरान जब इंजीनियरिंग की एक छात्रा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र से डिस्लेक्सिया नामक बीमारी पर चर्चा की और इसके इलाज के बारे के लिए सुझाव पेश किया तो पीएम मोदी ने इस पर ये कहकर चुटकी ले ली कि क्या ये 40-50 साल के बच्चों के लिए भी कारगर होगा। ऐसे में पीएम मोदी के इस कटाक्ष के साथ डिस्लेक्सिया बीमारी भी चर्चाओं में है, आज हम आपको इसी के बारे में बताने जा रहे हैं, कि आखिर क्या है डिस्लेक्सिया की बीमारी, जो बचपन को बोझिल बना देती है ।
क्या है डिस्लेक्सिया
व्यवहारिक तौर पर बात करें तो आपने आमिर खान की फिल्म तारें जमीन पर देखी होगी, जिसमें आमिर के स्टूडेंट के किरदार में ईशान डिस्लेक्सिया बीमारी से पीड़ित बच्चा होता है, जिसकी पहचान उसके घरवाले भी नहीं कर पाते। वैसे ज्यादातर पैरेंट्स के साथ यही दिक्कत होती है कि वो अपने बच्चे की इस समस्या को समझ नहीं पाते और उल्टे बच्चे पर दबाव बनाते रहते हैं। इसलिए सबसे जरूरी है कि आप इस समस्या को समझ सकें।तो चलिए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से ।
इसके लक्षण
असल में, डिस्लेक्सिया बच्चों में ग्रोइंग एज में होने वाली ऐसी कंडिशन है, जिसमें बच्‍चों को पढ़ने, लिखने और शब्दों का बोल पाने में मुश्किल होती है। या फिर वो अक्षरों को उल्टा लिखते हैं। साथ ही ऐसी कंडिशन में बच्चे शब्दों को याद भी नहीं रख पाते हैं और उनके लिए चीजों को समझना कठीन होता।
तीन तरह की होती है डिस्लेक्सिया
वैसे डिस्लेक्सिया के भी तीन प्रकार होते हैं... जैसे कि पहली स्थिति में बच्चे को अक्षर और संख्या की पहचान करने मुश्किल होती है साथ ही उन्हें पढ़ने और दूसरी गतिविधियों में भी मुश्किल होती है। वहीं दूसरी स्थिति में भ्रूण में ही बच्चों का दिमागी विकास न होने के कारण बच्चे को शब्दों की पहचान और उनकी बोलने में समस्या आती है। जबकि तीसरी कंडिशन में बच्चों में दिमागी चोट लगने के कारण होती है, जिससे बच्चा शब्दों की ध्वनि नहीं सुन पाता है और इसलिए उसे शब्द बोलने और पढ़ने में कठिनाई होती है।
कैसे करें इससे पीड़ित बच्चों से व्यवहार
वैसे तो ये बीमारी लाइलाज है, पर अगर पैरेंट्स और टीचर कुछ बातों का ध्यान रखें तो इससे पीड़ित बच्चा भी आसानी से पढ़ लिख सकता है। इसके लिए आपको सबसे पहले बच्चे को पढ़ने का तरीका बदलना होगी। आप उन्हें किताबी ज्ञान देने के बजाए खेल-खेल में और रूचिकर तरीके से पढ़ाएं, ताकी उन्हें आपकी बात जल्दी समझ आए। इसके लिए आप पेंटिंग या कहानियों का सहारा ले सकते हैं। वहीं अगर बच्चे को अक्षर की पहचान करने या लिखने में कठीनाई हो रही हैं तो वही अक्षर उससे बार-बार लिखवाएं। साथ ही ऑफ उन्हें वोकेशनल ट्रेनिंग या स्पीच थैरेपी भी दिलवा सकते हैं।
Author: Yashodhara Virodai
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