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अपने हिस्से का दुःख सबको भारी लगता है। लेकिन वास्तव में जो भारी सा महसूस होता है, वह कभी दुःख हो ही नहीं सकता है है। जी हाँ, यह बात सुनने तो ज़रा अजाब सी ज़रूर लगेगी, लेकिन इसमें पूरी सच्चाई है और हकीक़त भी यही है कि अगर आपको अपना दुःख बारी लगने लगा है तो फिर आप अबी क़ायदे से दुःख में ही नहीं पहुँचे हैं, क्योंकि दुःख का विष तो व्यक्ति को कुछ भी एहसास नहीं करने देता है। वह व्यक्ति को अपने में इतना डुबाकर रखता है कि व्यक्ति उफ़्फ न कर सके। अब समझने वाली बात यह है कि दुःख में महसूस होने वाला भारीपन है क्या?
आपको बता दें कि दुःख में जो भारीपन हमें महसूस होता है वह व्यक्ति की अक्मण्यता का परिणाम होता है। जी हाँ, वास्तव में होता यह है कि जब भी इंसान को भारीपन महसूस होता है तो वह उसे दुःख कह देता है। इसी प्रकार आजकल एक और आदत लोगों को हो चली है- हर बात को स्ट्रगल कह देने की।
आज ऐसा दौर है कि हममे से ज़्यादातर लोग अपनी दैनिक दिनचर्या को स्ट्रगल कहने लगा है। अगर वह अपने हाथों खाना बनाकर ऑफ़िस जाता है या स्कूल जाता है, तो वह से स्ट्रगल कह देता है। ऐसे ही कुछ लोग आधे घंटे ट्रैफिक में फँसकर निकलने के बाद स्ट्रगल करने सा महसूस करते हैं और ऐसा ही बखान करते हैं। हालाँकि ट्रैफ़िक में फँसना कष्टकारी ज़रूर है, लेकिन वह स्ट्रगल तो बिल्कुल भी नहीं है।
आजकल लोगो में हर छोटी-बड़ी चीज़ को स्ट्रगल समझने की मानसिकता पनप रही है। दउःख की बात तो यह है कि ऐसा गाँव और शहर हर जगह है। गाँव में लीजिए पहले चावल-गेहूँ बिनना और खाना बनाना तथा ऐसे ही अन्य घरेलू कामों को करने के बाद स्त्रियाँ ढूढ़ती थीं कि अब कोई काम हो तो किया जाये, जबकि अब दिनचर्या के इन्हीं कार्यों को वह मुख्य काम समझती है। तना ही नहीं, इतने में ही ज़रा उन्हें अपना एक बच्चा सँबालना पड़ जाये तो वह झट से कह देती हैं कि हमने बड़ा स्ट्रगल किया है, जबकि यह सब स्ट्रगल नहीं, बल्कि जीवन का सामान्य हिस्सा होता है।
जी हाँ, अगर आपको अपने हिस्से का स्ट्रगल ज़्यादा लगता है, तो इन लोगों से आपको मिलना चाहिए। आप मिल सकते हैं ऐसे लोगों से जो दिनभर दूसरों का काम करते हैं और बदले में मिलने वाले 300-400 रुपये भी अगले दिन मिलते हैं, ऐसे में वह उनके स्ट्रगल को समझने की कोशिश आप कर सकते हैं कि वह कैसे अपने रात के खाने का बंदोबश्त करता होगा। ऐसे लोगों के बच्चों का बीमार होना तो ख़ुदा की तरफ़ से सख़्त मना होता है। और हाँ, यह सब इस देश में आम बात है, जो शायद महानगरों में जन्में लोगों को कम समझ में आये।
ऐसे ही आप मिल सकते हैं किसी दिहाड़ी मजदूर से और देख सकते हैं उसके पूरे एक दिन भर का स्ट्रगल। कबाड़ बिनने वाला लड़के से कभी बात कीजिए तो आपको स्ट्रगल का असल मतलब पता चल सकता है। इसलिए आप अपने ज़िन्दगी में ज़रूरी रोज़मर्रा के कामों को अपने स्ट्रगल का हिस्सा मानना छोड़िए और सशक्त होकर काम कीजिए और आगे बढ़िये... आनन्द आयेगा।
Author: Amit Rajpoot
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