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लड़कियों की सफ़लताएँ आसमान छू तो रही हैं, मगर इसके पीछे एक सच्चाई यह भी है कि इसके लिए उन्हें लड़कों से अधिक मेहनत करनी पड़ती है और काफी ज़्यादा मज़बूद इरादे भी। जी हाँ, आपको बता दें कि आज भी हम एक ऐसे समाज का हिस्सा हैं, जहाँ कि महज दो-चार फीसदी आबादी ही अभी वैचारिक रूप में इतनी प्रगतिशील हो पायी है कि उनके परिवारों में लड़का और लड़की को बराबरी के साथ पाला जाता है, पढ़ाया जाता है और बराबरी के साथ ही उन्हें सपने भी देखने का मौक़ा दिया जाता है। ससे ज़रा सा नीचे एक ऐसा बड़ा शिक्षित विकासशील मध्यम वर्ग है, जहाँ लड़कियों के पालन और शिक्षण में तो उन्हें बराबरी का ओहदा दे दिया जाता है, लेकिन उन्हें सपने आज भी वही देखने पड़ते हैं, जो उनके माँ-बाप उसके लिए देख रहे होते हैं।
लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि आख़िर इस पूरे सीन में इन आज़ादी की चाह रखने वाली लड़कियों का असली दुश्मन कौन है? शायद नहीं। बहरहाल, आप यह समझ लीजिये कि अमूमन जब भी लड़कियों के उत्थान की बात होती है या उनकी प्रगति की चर्चा होती है तो उनकी बाधा के रूप में पूर्वाग्रहित होकर पुरुष समुदाय को ही कहीं न कहीं दोषी माना जाता है। लेकिन ऐसा है नहीं। आइए आज हम आपको ऐसे 3 विलेन से मिलवाते हैं जो औरतों या लड़कियों की सबसे बड़ी दुश्मन होती हैं।
लेडी गायनो या माँ:
लड़कियों या औरतों के विलेन उसके गर्भ में होने के समय से ही पनप जाते हैं। जी हाँ, बेटी को गर्भ में मार देने की प्रवृत्ति अभी बनी हुयी है, हालाँकि इस बारे में क़ानून ज़रूर आ चुके हैं। बावजूद इसके भ्रूण में बेटियों को मार देने में समाज अभी भी नहीं चूकता है और यह चूक बिना माँ अथवा काफी हद तक लेडी गायनों की सहमति या आंशिक सहमति के बग़ैर संभव ही नहीं है।
सख़्त मम्मियाँ:
लड़कियों की दिनचर्या और उनके पहनावे के बारे में एक बाप से ज़्यादा उसकी माँ ही रोक-टक करती है। ये सख़्त टाइप की मम्मियाँ ही लड़कियों की आज़ादी की सबसे बड़ी विलेन होती हैं।
सासू माँ:
दुनिया की कोई भी सास ऐसी न होगी, जो अपनी बहू को फूटी आँखों भाये। जहाँ-जहाँ ऐसी सासू माताएँ हैं, वो किसी अजूबे की तरह ही देखी जाती हैं। कुल मिलाकर यह जान लीजिये कि औरतों की सबसे अव्वल दर्ज़े की दुश्मन कोई औरत ही होती है, इसके बाद ही किसी की दुश्मनी डिज़र्व करती है।
Author: Amit Rajpoot
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