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2003 के बाद से कहीं न कहीं बीमारी संचारी से गैर-संचारी यानि एनसीडी में स्थानांतरित हो गया। अब हम कैंसर, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, धमनी रोग और अन्य बीमारियों के मामलों में भारी वृद्धि देख रहे हैं। इनमें से कई बीमारियों में रोगियों की विशेष देखभाल की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन और मधुमेह और हृदय रोग के लिए पर्याप्त बुनियादी देखभाल की जरुरत पड़ती है।
लेकिन जहां तक कैंसर के उपचार की बात है, अगर आप कैंसर अस्पतालों की तलाश करते हैं तो भारत में यह पर्याप्त नहीं है। खासकर सरकारी क्षेत्र में तो बिल्कुल ही यह पर्याप्त नहीं हैं। दिल्ली में AIIMS की एक कैंसर इकाई है लेकिन अन्य प्रमुख सरकारी अस्पतालों जैसे कि सफदरजंग, राम मनोहर लोहिया, मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज और यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ मेडिकल साइंसेज के पास नहीं है। बहुत सारे अस्पतालों में रेडियोथेरेपी, हाई-एंड कीमोथेरेपी, पीईटी (पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी) स्कैन की सुविधा बिल्कुल ही नहीं है।
क्या कैंसर के इलाज में सुधार हुआ है?
ऐसे में सवाल यह है कि क्या कैंसर के उपचार ने तेजी से प्रगति की है। इसका जवाब हां में है, क्योंकि हम आणविक निदान की ओर तेजी से बढ़े हैं। कई कैंसर जो घातक थे उन्हें अब पुरानी बीमारियां माना जा रहा है। फिर भी भारत में लोगों के पास इलाज करवाने और ठीक होने का विकल्प होना चाहिए।
देश में चुनौती सिर्फ कैंसर का इलाज नहीं है, बल्कि इसे रोकने और लोगों को जागरूक करने की भी है। साथ ही इसको हराने के लिए दवाओं के बारे में जागरुकता जरूरी है।
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