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मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है, जो श्रेष्ठता और सुन्दरता का प्रतीक है। भारत में प्रचीन समय से मोर पंख को मुकुट और सिंहासनों पर लगाया जाता रहा है। मोर पंख में स्याही भरकर लिखने वाले कवियों ने भी ऐसा करने के पीछे इसकी महत्ता को रेखांकित किया है। उन्होंने बताया कि मोर की मान्यता भारतवर्ष और हिन्दू धर्म में सबसे पर है। भगवान कृष्ण मोर पंख को अपने मस्तक पर धारण करते थे। इसके अलावा भगवान शंकर के पुत्र कार्तिकेय कुमार मोर को ही अपने वाहन के रूप में प्रतीक किया है। इस प्रकार, हम देखते हैं कि मोर की मान्यता भारत में लगभग प्रत्येक युग में रही है।
आपको बता दें कि सम्राट अशोक के ज़माने में भी मोर को बहुत ज़्यादा महत्व हासिल था। चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्य मे प्रचलित सिक्कों की मुद्र पर एक तरफ़ मोर का चित्र छपा होता था। मुग़ल बादशाह शाहजहाँ जिस तख़्त पर बैठता था, उसकी आकृति मोरनुमा ही थी। हीरे-मोतियों से जुड़े इस सिंहसान को तख़्त-ए-ताऊस कहा जाता था। मालूम हो कि अरबी भाषा में ताऊस का मतलब मोर होता है। इस प्रकार तख़्त-ए-ताऊस का अर्थ हुआ मोर का सिंहासन।
मोर को राष्ट्रीय पक्षी बनाये जाने के पीछे का कारण यह है कि मोर दुनिया में सबसे पहले भारत में ही पाया जाता रहा है। सारस, हंस और ब्रह्मणी जैसे पक्षियों पर भी विचार किया गया था, लेकिन अंत में मोर को ही चुना गया। माना जाता है कि मोर मूल रूप से भारत में ही पाये जाते रहे हैं, लेकिन सिकन्दर मोर को सबसे पहले यूनान ले गया और इसके बाद मोर दुनियाभर में फैल गये। हालाँकि आज भी मोर की सबसे अच्छी प्रजातियाँ भारत में ही पायी जाती हैं।
Author: Amit Rajpoot
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