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भारत में जातियों से जुड़ी उनकी परंपरागत पहचान को तोड़ पाना बेहद मुश्किल काम है। यही कारण है कि किसी अमुक जाति के परिवार में पैदा हुये इंसान से यही अपेक्षा की जाती है, कि वह भी अपनी जाति क् परंपरागत पहचान के अनुरूप ही काम करे। समाज में कई जातियों के लिए फैली लोकोक्तियाँ उसी कुप्रचलन का स्याह उदाहरण हैं। ऐसी ही दाहरणों को ध्वस्त करने वाले लोग दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। आइए आज हम आपको ऐसी ही एक प्रेरक शख़्सियत दक्षिण छारा से रू-ब-रू करवाते हैं, जिन्होंने ब्रितानी हुकूमत से गढ़ी गयी अपनी जाति की परंपरागत पहचान की बेड़ियों को तोड़कर अपने समाज के लोगों को मुख्या धारा में लाने का बेहद ज़रूरी और प्रेरणादायी कार्य कर रहे हैं।
आपको बता दें कि गुजरात के रहने वाले दक्षिण छारा जिस जातिगत समुदाय से आते हैं, उनकी छारा जाति का सीधा संबंध अपराध करने वाली जाति के तौर पर समझा जाता है। वास्तव में गुजरात के अहमदाबाद और उससे सटे इलाक़ों के भीतर ‘छारा’ शब्द सुनते ही लोगों के कान खड़े हो जाते हैं। छारा यहाँ कलंक समजा जाता है और यह अंग्रेज़ों के लिखे उनके इतिहास के कारण ऐसा बना हुआ है। अपनी जाति के इसी कलंक को मिटाने की कोशिश दक्षिण छारा बीते 20 सालों से कर रहे हैं।
दिलचस्प है कि दक्षिण चारा अपनी जाति के किशोरों और युवाओं को लेकर ‘बुधन थियेटर’ चलाते हैं। यहाँ, वो अपने समाज के इन्हीं लोगों को रंगकर्म, पेंटिंग, गीत-संगीत और अन्य तरह की शिक्षा प्रदान करने का काम करते हैं। इसके जरिये वह समाज के लोगों को बताना चाहते हैं, कि उनके समाज में बी पढ़े-लिखे लोग हैं, कलाकार, अभिनेता और चित्रकार हैं। आपको बता दें कि बीते 20 सालों में दक्षिण चारा ने हज़ारों ज़िन्दगियाँ बदलकर रख दी हैं।
ग़ौरतलब है कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की क्रान्ति को सुनियोजित बनाने के लिए और संदेशों व हथियारों को एक जगह से दूसरी जगह तक पहुँचाने के लिए इन्हीं घुमंतू छारा जातियों ने सहयोग किया था। वास्तव में इनकी स्वतंत्रता संग्राम में बड़ी भूमिका थी, लेकिन इनकी भूमिका को रेखांकित नहीं किया गया। उल्टे अंग्रेज़ी इतिहासकारों ने इन्हें बदमाश, लड़ाकू और बुरा घोषित कर दिया था। अब इसी कलंक को मिटाकर अपनी जाति को मुख्य धारा में जोड़ने का प्रयास दक्षिण छारा कर रहे हैं।
Author: Amit Rajpoot
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