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एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को इस जानलेवा बीमारी से छुटकारा दिलाने के पहले मामले के 10 साल बाद, 'लंदन के रोगी' के रूप में प्रसिद्ध शख्स में 19 महीनों तक इसके वायरस का कोई संकेत नहीं दिखाया है। इन दोनों रोगियों के इलाज के लिए अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण प्राप्त था। जोकि दुर्लभ आनुवंशिक चेंज के साथ दाताओं से स्टेम सेल प्राप्त किया गया था, जोकि एचआईवी को रोकता है।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में एक प्रमुख लेखक रवींद्र गुप्ता ने इस बारे में बताया कि " इसी तरह का इलाज करके हमने एक दूसरे रोगी को एड्स मुक्त किया है। दुनिया भर में एचआईवी से संक्रमित लाखों लोग तथाकथित एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरवी) के साथ बीमारी की जांच करते हैं, लेकिन यह उपचार वायरस के रोगियों से छुटकारा नहीं दिलाता है।"
डॉ. गुप्ता के मुताबिक फिलहाल एचआईवी के इलाज का एकमात्र तरीका वायरस को दबाने वाली दवाएं हैं, जिसे लोगों को अपने पूरे जीवन में लेना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि यह विकासशील देशों में एक विशेष चुनौती है, जहां लाखों लोगों को अभी भी पर्याप्त उपचार नहीं मिल रहा है।
एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया भर में 37 मिलियन के करीब लोग एचआईवी के साथ जी रहे हैं। लेकिन उनमें से केवल 59 प्रतिशत लोग एआरवी प्राप्त कर रहे हैं। वहीं एचआईवी से हर साल लगभग 10 लाख लोग मारे जाते हैं। इस मामले में गुप्ता और उनकी टीम ने जोर देकर कहा कि अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण एक खतरनाक और दर्दनाक प्रक्रिया है। साथ ही ये एचआईवी उपचार के लिए एक व्यवहारिक विकल्प नहीं है।
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