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प्रेरणा बन जाना बिल्कुल भी आसान काम नहीं है, कि कुछ और लोग भी आपको फॉलो करने लगें और वैसा ही कुछ करना चाहें जैसा कि आप कर रहे हों। वास्तव में कुछ अलग करने की ललक की किसी को औरों से अलग ला खड़ा करती है, लेकिन आम लोग चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकते हैं, क्योंकि इसके लिए बड़ी इच्छा शक्ति की ज़रूरत पड़ती है और बहुत सारे लाभ के अवसर खोने पड़ते हैं। ऐसा ही कुछ करना पड़ा था आकांक्षा सिंह को। आपको बता दें कि आकांक्षा साल 2014 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ (TISS) से सामाजिक उद्यमिता में मास्टर डिग्रीधारी हैं, जो कहीं भी अच्छी ख़ासी पगार पर अपनी लाइफ़ सेट कर सकती थीं, लेकिन इन्होंने ऐसा नहीं किया।
जी हाँ, अपनी मास्टर्स डिग्री लेकर वह मध्यप्रदेश के झाबुआ ज़िले के एक गाँव में आकांक्षा इंटर्नशिप के लिए चली गयीं। वहाँ उन्होंने गाँव की जो स्थित देखी, उससे उनके मन में कुछ अलग करने का जज़्बा पैदा हो गया। उन्होंने गाँव में देखा कि वहाँ बिजली नहीं है, जिसके कारण औरतें शाम ढलने सेपहले ही खाना बना लेती थीं, जिसे वो रात को 10 बजे के आसपास ही खाती थीं। ऐसे में उन्हें ठंडा भोजन ही नसीब होता था।
इसके अलावा आकांक्षा के लिए यह भी एक बड़े आश्चर्य की ही तरह था कि गाँव के लोग अपना मोबाइल चार्ज़ करने के लिए किसी बड़े ज़मीदार को एक बार की चार्ज़िंग के लिए 5 रुपये दे देने में गुरेज न करते। सके अलावा खेती के समय जब इन लोगों को बिजली की ज़रूरत पड़ती थी तो ये ज़मीदार ही इन्हें बिजली देते थे, पर एक घंटे की बिजली के लिए इन आम किसानों से ज़मीदार 150 रुपये ले लेते थे।
ये सब बातें आकांक्षा के दिमाग़ में घर कर गयीं और फिर इन्होंन सोचा कि ग्रामीण जीवन पशुपालन पर ही तो निर्भर है और यहाँ बायोइलेक्ट्रिसिटी की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। फिर क्यों न गाँव के हर अंधेरे कोने को बायोइलेक्ट्रिसिटी के ज़रिए रोशन किया जाये।
फिर क्या था, आकांक्षा ने ‘स्वयंभू’ नाम से एक बिहार के समस्तीपुर जाकर एक एनजीओ बनाया और बायोइलेक्ट्रिसिटी के माध्यम से वहाँ के सभी गाँवों को क्त समस्याओं से मुक्त कराया। आकांक्षा का ये प्रयास आगे जारी है। देश के अन्य युवाओं को इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।
Author: Amit Rajpoot
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