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ईश्वर प्राप्ति का वह मार्ग जिसमें कर्म की प्रधानता हो जब यही कर्म जीवात्मा परमात्मा के मिलन का साधन‌ बन जाये तो कर्मयोग कहलाता है। अनेक गुणों के आधार पर कमॏ का वर्गीकरण इष्ट,अनिष्ट,शुभ अशुभ, राजस, कामस,प्रारब्ध,निष्काम,संकाय आदि है।जब कोई कार्य अपने हित में किया जाता है तो उसे निष्काम कर्म कहते हैं। यह व्यतिगत सामाजिक इहलोक परलोक समाज‌ राष्ट्र किसी भी क्षेत्र में हो सकता है।
निष्काम कर्मयोग को ही नैष्कम्र्य, मदर्थकर्म, तदर्थकर्म, समत्वयोग भी कहते हैं। कर्म की परिभाषा व्यापक होने के कारण कोई भी मनुष्य विना कर्म के नहीं रह सकता। यह महत्वपूर्ण है कि हम कर्म कैसे करें?कौन से कर्म करें? कर्म सिद्धांत के अनुसार हम जैसे कर्म करते हैं उसका फल वैसे ही होता है। कर्म यदि लोककल्याण, लोक-मंगल हेतु शुद्ध मन से किया जाये तो वहीं निष्काम कर्म योग होता है।
गृहस्थ आश्रम में रहकर भी जो मनुष्य शुद्ध समत्व भाव से कर्म करता है और जिसका आचरण सरल होता है वो भी निष्काम कर्म योग है। यह मनुष्य को एकांत में जाना चाहिए सिखाता है बल्कि संसार में रहकर युद्धभूमि की भाति कर्म करते हुए परमपद की प्राप्ति करवाता है। इसके साधक केवल नियत कर्म ही करें फल इच्छा का अभाव रखे समत्व बुद्धि समान व्यवहार करें।
हम यदि पूर्ण सेवा भाव से समाज की राष्ट्र की सेवा करते हैं तो वहीं निष्काम कर्मयोग है। हम प्रकृति से जितना लेते हैं उससे अधिक उसकी सेवा कर देने की इच्छा करे यही निष्काम कर्म हैं ।
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