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हमारे जीव मण्डल में कई तरह की जैव श्रृंखलाएँ काम करती हैं, चाहे वो भोजन के मसले पर हो या फिर जीवन यापन के संदर्भ में। एक जीव का दूसरे जीव पर प्रबाव पड़ता है। इसीलिए इस पृथवी पर जितने मनुष्य महत्वपूर्ण हैं, उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जीव-जन्तु और पेड़ पौधे। लेकिन आज का इंसान इतना स्वार्थी और एकाकी सोच वाली हो गया है कि उसे इंसान होकर इंसानों से ही कोई खडास जुड़ाव नहीं महसूस होता है। ऐसे में जानवरों और घास-फूस के बारे में उनके तादात्म्य की तो कोई गुंजाइश ही नहीं बचती है।
यही कारण है कि आज हमारी जैव विधतता कम हो रही है और उससे हमारे जीवन की गुणवत्ता। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो पारिस्थितिकी में संतुलन लने के लिए दूरदृष्टि रखते हैं और इसके लिए किये जाने वाले प्रयासों में ख़ुद को खपा भी देते हैं। पारिस्थितिकी के ऐसे ही महान दूत हैं संदीप तांबे।
संदीप तांबे मूलतः मध्यप्रदेश के मंडला ज़िले में स्थित नकवाल गाँव के रहने वाले हैं, जो नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ है। संदीप तांबे का ये गाँव चारो ओर सतपुड़ा की पहाड़ियों से घिरा हुआ है, जहाँ दूर तक फैले खेत भी हैं। इस माहौल और परिवेश ने संदीप तांबे के मन में बचपन से ही प्रकृति के प्रति गहरा जुड़ाव पैदा कर दिया। पढ़ने-लिखने में तेज़-तर्रार संदीप तांबे का सेलेक्शन साल 1990 में मुम्बई आईआईटी में हो गया। उन्हीं दिनों वे वाइल्ड लाइफ़ क्लब से जुड़े और पश्चिमी घाट, मुदुमलई नेशनल पार्क और रणथंबौर नेशनल टाइगर रिज़र्व जैसी जगहों में जाकर नेचर के पति अपने जुड़ाव को और भी ज़्यादा एक्सप्लोर किया।
संदीप तांबे ने अब तक ये तय कर दिया था कि वे प्रकृति के संरक्षण की दिशा में ही करिअर बनाएँगे। लिहाजा उन्होंने यूपीएससी की तैयारी की और भारतीय वन सेवा अधिकारी बन गये। संदीप तांबे को सिक्किम कैडर मिला और उनकी पोस्टिंग साउथ सिक्किम और वेस्ट सिक्किम ज़िलों के प्रभारी के तौर पर हो गयी। यहाँ वनों का कोई पर्याप्त ढाँचा नहीं था, जिससे वनों का संरक्षण बड़ी चुनौती थी। शिकारियों से वन्य जीवों को ख़तरा, वन संरक्षण क़ानूनों का वहां के लोगों का अमल न करना, व्यवस्थित चारागाह का न होना, मवेशियों का छुट्टा होना और वनों की अंधाधुँध कटाई आदि की भारी समस्याओं के कारण वहाँ जैव पारिस्थितिकी पर इसका बहुत बुरा असर होता था।
संदीप तांबे के पास स्टाफ कम था और ये सिक्किम की हालत दुरुस्त करना चाहते थे। लिहाजा कोई और साधन होने के कारण इन्होंने गाँव वालों को ही जागरुक करना शुरू कर दिया। जागरुरकता के प्रयासों के अलावा संदीप तांबे ने वहाँ इको डेवलपमेंट कमेटी बनाई और इनमें शामिल लोगों को वनों को नुकसान पहुँचाने वाले लोगों पर कार्रवाई का अधिकार दिया। इसमें राज्य सरकारों की भी मदद ली गयी। चरवाहों से मवेशी लेकर ग़रीब किसानों में बाँटी गयी। इस तरह के अनेक कामों से आज संदीप तांबे ने सिक्किम को प्राकृतिक रूप से स्वच्छंद क्रीड़ा करने का अवसर दिया और लोगों के प्रेरणास्रोत बनें।
Author: Amit Rajpoot
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