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देश को आज़ाद हुये 70 साल से ज़्यादा का समय बीत चुका है। आज़ाद भारत में अमन और चैन के साथ रहने के लिए समतामूलत समाज की परिकल्पना की गयी और इसके लिए रचे गये संविधान की शपथ लेकर देश का आम नागरिक ख़ुद को प्रगतिशील और ग़ैर जातिवादी बताता तो हैं, लेकिन वास्तव में हमारे समाज की तस्वीर ऐसी नहीं है। जी हाँ, स्याह पन्नों में भला कहाँ कोई रंग अपनी छाप छोड़ पाता है, लिहाजा छुआछूत की कालिख़ से आज भी हमारा समाज ख़ुद को सतरंगी बताने का दंभ भरता है। इसकी पोल खोलने के लिए हमें ख़ासा बड़े-बड़े उदाहरण मिलते रहते हैं, लेकिन बावजूद इसके डॉ. भीमराव अंबेडकर के बाद कोई और छुआछूत की इन बेड़ियों को तोड़ने के लिए आज तक आगे न आया।
ऐसी अपेक्षा मन में हर कोई पालता तो है, लेकिन सच में ऐसे किसी व्यक्ति का सामना नहीं हो पाता। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे शख़्स से मिलवाने जा रहे हैं, जिन्होंने जाति प्रथा की बेड़ियों को तोड़ने में अपनों से नाता समेत तोड़ दिया है। इनका नाम है संजीव कुमार। संजीव कुमार बिहार के खगड़िया ज़िले के परबत्ता गाँव के रहने वाले हैं। साल 2005 में संजीव कुमार ने अपनी दीदी की ससुराल में उनकी सास के श्राद्ध समारोह में कुछ लोगों को पत्तलों में बचे अवशिष्टों को बटोरने के लिए कोशिश करते देखा। इस दृश्य ने संजीव कुमार को भीतर तक दहला दिया।
इसके बाद से संजीव कुमार ने मन ही मन सोच लिया कि जाति प्रथा की इस बुराई को वो अपनी हर कोशिश के साथ ख़त्म करने का मरते दम तक पूरा प्रयास करेंगे। इसके लिए संजीव कुमार ने बहिष्कृत हितकारी संगठन (बीएचएस) नाम की एक संस्था बनाई, जिसके द्वारा वह दलितों को शिक्षित करने हैं और उनमें कौशल विकास कर अपने हक़ की लड़ाई लड़ने का काम करते हैं।
संजीव कुमार ने बहिष्कृत हितकारी संगठन इसलिए बनाया, क्योंकि अछूत समझी जाने वाली तथाकथित नीची जातियों से मेलजोल बढ़ाने और उनकी सुध लेने के चक्कर में संजीव कुमार को पहले इनके रिश्तेदारों, इनके दोस्तों और घर के लोगों ने इन्हें अपने समाज से बहिष्कृत कर दिया। हैरानी तो इस बात की है कि संजीव कुमार को आज से नौ साल पहले उनकी इसी कार्य-शैली के चलते पत्नी भी छोड़कर चली गयी थी। बावजूद इसके छुआछूत ख़त्म करने का संजीव कुमार का अभियान अब भी जारी है।
Author: Amit Rajpoot
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