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मीराबाई को आज कौन नहीं जानता। भक्ति काल की इस बेहद चर्चित शख़्सियत ने दुनिया को प्रेम सिखाया और त्याग के मार्ग पर चलकर ख़ुद को पैदा करने के गुर और हिम्मत भी मीराबाई की देन है। भगवान कृष्ण की भक्ति में मीराबाई इस क़दर खोई हुयी थीं, कि लोगों ने इन्हें अपने से कटा-कटा महसूस किया। इसका कारण भगवान कृष्ण की भक्ति का मीराबाई का अपना विशिष्ट तरीक़ा था। आपको बता दें कि मीराबाई भगवान कृष्ण से प्रेम करती थीं और उन्हें अपना पति परमेश्वर सबकुछ मानती थीं। ये भगवान कृष्ण की कृष्ण भक्ति में इतनी बावली हो चलीं कि इसके चक्कर में इन्हें अपनी जान तक गवानी पड़ी, जो आज तक रहस्य बनी हुयी है।
आपको बता दें कि मीराबाई का जन्म संवत् 1504 विक्रमी में मेड़ता में दूदा जी के चौथे पुत्र रतन सिंह के घर हुआ। कई किताबों में मीराबाई का जन्म कुड़की में बताया जाता है, जो कि बिल्कुल गलत है क्योंकि कुड़की जागीर रतन सिंह जी को मीरा बाई के 11वें जन्मदिन पर उपहार में मिली थी। इसे और भी विस्तार से जानने के लिए आप मीरा चरित का सहारा भी ले सकते हैं। मीरा का जन्म राठौर राजपूत परिवार में हुआ और उनका विवाह मेवाड़ के सिसोदिया राज परिवार में हुआ था। उदयपुर के महाराणा कुँवर भोजराज इनके पति थे, जो मेवाड़ के महाराणा सांगा के पुत्र थे। विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति का देहान्त हो गया।
बहरहाल मीराबाई अपने बचपन से ही कृष्णभक्ति में रुचि लेने लगी थीं। लेकिन मेवाड़ के लोगों को मीरा की इस रुचि ने उद्वेलित कर दिया, जिससे वहाँ के लोग मीराबाई को कड़ाई से समझाने लगे। धीरे-दीरे मेवाड़ के रूढ़िवादी कट्टरपंथी का द्वेषपूर्ण विरोध बढ़ता ही गया। मीराबाई के सद्गुरू प्रेम ने उनके विरोद ने आग में घी का काम किया। लिहाजा मीराबाई को लोग पथभ्रष्ट कहने लगे, लोगों ने कहा कि वो अपने कुल के लिए कलंक हैं, अपने भले-बुरे की सोच खो बैठी हैं। यहाँ तक कि मीराबाई के बारे में लोगों ने यह भी कहा कि वह पागल हो चुकी हैं।
राणा और उनके सलाहकारों ने मीरा की हत्या के लिए अनेक षड़यंत्र रचने लगे। इन्हीं में से एक है मीराबाई को विष का प्याला भेजना। अंत में मीराबाई को भगवान कृष्ण की मूर्ति छीनकर एक कमरे में बंद कर दिया, जहाँ कहते हैं कि मीराबाई ने कृष्ण से मिलने की चाह में अपने प्राण त्याग दिये थे। हालांकि इतिहासकार आज भी मीराबाई की मृत्यु पर संदेह जताते हैं, क्योंकि काल कोठरी के भीतर मीराबाई के साथ क्या हुया था ये कोई नहीं जानता।
Author: Amit Rajpoot
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