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माँ आपको जीवन का आधार होती है तो पत्नी जीवन की मजधार को पार कराने वाली माँझी, ऐसे में जीवन को पार कराने के लिए आदार और माँझी दोनों की ही शख़्त ज़रूरत होती है, क्योंकि यदि जीवन का आधार ही नहीं रहेगा तो जीवन के अस्तित्व की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। इसके अलावा माँझी के बग़ैर आप कितने भी अस्तित्व और हैसियत वाले क्यों न हों, लेकिन जीवन की मझधार में आपका डूबना तय ही है, जिससे आपका अस्तित्व क्षण भर में नष्ट हो जाएगा। ऐसे में आपके जीवन में माँ और पत्नी दोनों का ही अलग-अलग अपना सेप्रेट स्पेस होता है।
हालांकि ज़्यादातर लोगों से जो सबसे बड़ी भूल हो जाती है, वो यह है कि वे इस तुलना में लगे रहते हैं कि पत्नी को अपनी लाइफ़ में तवज्जो दें कि माँ को। कई बार तो कुछ लोगों के सामने मसला यहाँ तक चला जाता है कि माँ और पत्नी में से किसी एक को ही चुनना पड़ जाता है। ऐसे में दरअसल, ये धारणा ही गलत है कि माँ और पत्नी को बराबर की अहमियत दी जानी चाहिए। जी हाँ, माँ और पत्नी को एक तराजू पर रखने की समाज की कोशिश भी पूरी तरह से ग़लत न सिर्फ़ है, बल्कि समस्या की असल जड़ यही है।
हर मर्द को यह बात अच्छे से समझना चाहिए कि शादी के बाद वह अपनी माँ का हर हाल में ख़्याल रखे और उनके सुक-दुःख का ध्यान दे। उन्हें अपने और अपनी पत्नी के बीच इनवॉल्व करे। इसके अलावा पत्नी को सपोर्ट के वक़्त भी उसे विचलित नहीं होना चाहिए। वास्तव में अगर कोई पति अपनी बीवी को ज्यादा वक्त देता है तो यह बिल्कुल अच्छी बात है, क्योंकि वह आपकी जिंदगी में तुरंत आई है और रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए ऐसा करना जरूरी भी है। इस प्रकार, दोनों ही रिश्तों के अपने अलग मायने हैं और उन्हें वैसे ही रहने दें।
Author: Amit Rajpoot
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