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दीपा परब वास्तव में महाराष्ट्र में पुलिस की नौकरी करना चाहती थी और इसके लिए वह मुम्बई में प्रॉपर ट्रनिंग भी ले रही थी। लेकिन दीपा परब को मुम्बई जैसे शहर में खर्चा उठाना भारी लग रहा था, लिहाजा उसमें मेक-अप या जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर भी वहाँ काम करते देखा। दीपा परब की ऑब्ज़र्वेशन पॉवर बड़ी स्ट्रांग थी। वह अपने आसपास की चीज़ों से क़रीब का राब्ता बनाने में माहिर थी। ऐस में एक दिन दीपा परब सेट पर हिराइन को चारो ओर से घेरकर खड़े बाउंसरों को देखने लगी। दीपा उन बाउंसरों की लाइफ़ को और भी क़रीब से समजना चाहती थी, लिहाजा उसमें उन लोगों से बात की और उनके क़रीब पहुँची।
बाउंसरों ने और उनके काम ने दीपा परब को इतना प्रभावित कियाकि उसने भी बाउंसर बनने की ठान ली और अब वह भी उन बाउंसरों के साथ इवेंट्स में एक बाउंसर के रूप में जाने लगी। एक बार की बात है कि दीपा परब किसी पब में बाउंसर बनकर खड़ी थी और उनकी ड्यूटी लेडीज़ बातरूम में लगी थी। ऐस में उन्होंने अपने लोगों से सवाल किया कि मुझे हमेशा लड़कियों के बाथरूम के आसपास ही क्यों खड़ा कर दिया जाता है, जबकि मैंने पुलिस की बाक़ायदी ट्रेनिंग ले रखी है। दीपा परब को उस दिन संतोषजनक उत्तर नहीं मिला।
ऐसे में उन्होंने तय किया कि अब वह अपना ग्रुप बनाएंगे, जिसमें वह सिर्फ़ महिला बाउंसरों को ही जोड़ेंगी। उन्होंने काम सुरू किया और फिर दीपा परब ने कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियों, गृहणियों और विधवाओं को बाउंसर बनाया है। जी हाँ, इन सबको उन्होंने पुलिस की वो सारी ट्रेनिंग दी जो उन्होंने हासिल की थी। दिलचस्प है कि दीपा परब ने अपने इस ग्रुप का नाम रखा है- रणकागिनी। आपको बता दें कि आज रणरागिनी में महज 3 वर्ष के भीतर 540 महिला बाउंसर हैं, जो ज़्यादातर उपेक्षित घरों से हैं। रणरागिनी से जुड़कर इनका जीवन सशक्त और उजाले में आ गया है।
Author: Amit Rajpoot
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