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अमेरिका और यूरोप में बसे किसी भी एशियाई नागरिक से आप वहाँ से आलीशान होटलों की बढ़ाइयाँ लगातार घंटों सुन सकते हैं। जी हाँ, ये बेहद आम बात है जब कोई आपको अमेरिका और यूरोप के इन हज़ार-हज़ार, दस-दस हज़ार, पचास-पचास हज़ार के कमरों वाले होटलों को बढ़ाई बताते न थके। वास्तव में पश्चिम के इन देशों में होटलों का चलन बहुत पुराना है। लेकिन क्या कभी आपने यह सोचा है कि भारत में पुराने ज़माने से लेकर आज भी ज़्यादातर धर्मशालाओं का ही चलन है। हालांकि इस बात से बिल्कल भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि भारत में भी अब बहुमंजिला और आलीशान होटलों की कमी नहीं है।
वास्तव में भारत में धर्मशाला और पश्चिमी देशों में होटल होने की अपनी-अपनी ज़रूरते थीं। भारत की ज़रूरत धर्मशालाएँ ही थीं, यहाँ होटलों की कभी भी ज़रूरत नहीं रही है। ग़ौरतलब है कि पुराने ज़माने से लेकर हाल-फिलहाल तक यूरोप की लगभग 85 फीसदी जनसंख्या के पास रहने के लिए घर नहीं हुआ करते थे। ये आँकड़ा अबी बहुत ज़्यादा इधर-उधर नहीं है। किराये के घरों में रहने का वहाँ आज भी अधिक चलन है। चूँकि उन्हें घर से बाहर जाने की तो इजाज़त थी, लेकिन अब सवाल ये है कि सँकरे फ्लैट्स में वो अपनी डिज़ायर को एंज्वॉय नहीं कर पाते हैं।
ऐसे में जब उनके पास अपने घर नहीं हैं तो सेक्स और रिलेशन की ज़रूरत को या फिर जीवन के आनंद को महसूस करने के लिए छुट्टियों में ये लोग कहाँ जायें। ऐसे में ऐश व आराम के लिए इन लोगों के लिए होटल एक बाज़ार के रूप में आया और इसका तेज़ी से चलन बढ़ा। ऐसे में हज़ारों-हज़ार के कमरों के होटल वहाँ बनाए गये। वहाँ हर हफ़्ते अपनी छुट्टियों को बिताने के लिए होटल लोगों की ज़रूरत बनती चली गयी और लोग होटलों के आदी होते गये। आज भारत भी होटलों की ज़रूरतों से जा घिरा है।
Author: Amit Rajpoot
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