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आधुनिक काल के बड़े हिन्दी कवि रामावतार त्यागी ने क्या ख़ूब लिखा है कि “मन समर्पित, तन समर्पित और यह जीवन समर्पित। चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ।” जी हाँ, अपने हिन्द भूमि के प्रति हर भारतवासी ऐसी ही सोच रखता है और चाहता है कि वह अपनी मिट्टी की सुरक्षा और समृद्धि के लिए क्या पाये और क्या कमाये कि उसे राष्ट्रहित में दान कर दे। वास्तव में यही सच्चा राष्ट्रवाद है इससे बेहतरीन देशभक्ति की कोई और दूसरी इबारत लिखी ही नहीं जा सकती है। लेकिन ख़ेद इस बात का है कि ऐसे लोग उँगलियों में भी गिनने के लिए नहीं मिलते हैं, जिन्हें हम राष्ट्रवाद के अमिट हस्ताक्षर के रूप में देख सकें और इन्हीं चंद उँगलियों में गिने जाने वाले महादानियों में से एक हैं मीर उस्मान अली ख़ान।
मीर उस्मान अली ख़ान एक महान देश के ऐसे लोगों में से एक हैं, जो अपने देश को मुसीबत में देखकर अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं। ग़ौरतलब है कि मीर उस्मान अली ख़ान साल 1965 में हैदराबाद के निजाम थे, जिन्होंने प्रधानमंत्री के कहने पर अपने देश की सेना को मज़बूती देने के लिए 5 चन सोना दान कर दिया था। इतना बड़ा दान आज तक किसी भी देश में किसी भी व्यक्ति अथवा संस्था ने अपने देश की सेना के लिए नहीं दिया है। इस महादान के साथ ही हैदराबाद रियासत में निजाम नहीं हुये अर्थात् मीर उस्मान अली ख़ान ही इस रियासत के अंतिम निजाम माने जाते हैं।
आपको बता दें कि साल 1947 में टाइम मैगज़ीन का कवर बने मीर उस्मान अली ख़ान वही हैं, जिन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के निर्माण हेतु पं. मदन मोहन मालवीय को फौरन ही एक लाख रुपये का चंदा दे दिये थे। दरअसल, जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे तो देश आर्थिक कमज़ोरी से जूझ रहा था और भयानक युद्ध की स्थिति थी। ऐसे में प्रधानमंत्री ने ‘राष्ट्रीय रक्षा कोष’ का निर्माण किया जिसमें मीर उस्मान अली ख़ान ने 5 टन सोना भरकर दान कर दिया था। वास्तव में राष्ट्रवाद किसी को सीखना हो तो मीर उस्मान अली ख़ान एक बेहतर उदाहरण हैं।
Author: Amit Rajpoot
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