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आज के समय में भोजन को लेकर कोई भी चिन्तित नहीं दिखाई पड़ता है, न ही समाज और न ही सरकारें। यही कारण है कि मैक डोनाल्ड्स और केएफ़सी जैसे अड्डों की बरमार हमारे देश में ख़ूब दिखायी पड़ती है, जबकि इनकी गुणवत्ता के मापन में न ही कोई नियमन है और न ही कोई ठोस और बेहतर व्यवस्था। जबकि यदि हम प्रचीन काल में शासकीय नियमों के अनुसार भोजन को देखें तो चाणक्य ने अर्थशास्त्र में भोज्य पदार्थ और पालतू पशुओं के संचालन के लिए शासकीय विभागों और पदों का जो गठन गठन किया गया था वह अद्भुत था। यह हमारी जीवन संस्कृति में भोजन के महत्व को प्रदर्शित करता था, आइए देखएं कि हमारी प्राचीन भोज्य व्यवस्था कैसी थी और देखएं कि कितना विकसित प्रबंधन हमारे देश मे हुआ करता था।
सेनाध्यक्षः
इसका कार्य बूचड़खानों को नियन्त्रण रखना था। बूचड़खानों के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के नियम होते थे। अनेक प्रकार के पशुओं और पक्षियों की हत्या निषिद्ध थी। सेनाध्यक्ष न केवल देश के विविध बूचड़खानों को नियंत्रित करता था, अपितु राजकीय पशु-वध शालाओं का प्रबन्ध भी उसके हाथों में था।
कुप्याध्यक्षः
कुप्य पदार्थों का अभिप्राय शाक, महुआ, तिल, शीशम खैर, शिरिष, देवदार, कत्था, राल, औषधि आदि से है। ये सब पदार्थ जंगलों में पैदा होते हैं। कुप्याध्यक्ष का कार्य यह था कि जंगलों उत्पन्न होने वाले विविध पदार्थों को एकत्र कराकर उन्हें कारखानों में भेज दें, ताकि वहां कच्चे माल को परिवर्तित किया जा सके। कुप्याध्यक्ष के अधीन द्रव्यपाल और वनपाल नाम के कर्मचारी होते थे, जो जंगलों से कुप्य द्रव्यों को एकत्र कराने तथा जगलों की रक्षा का कार्य करते थे।
विवीताध्यक्षः
गोचर भूमियों का प्रबन्ध इस विभाग का कार्य था। चोर तथा हिंसक जन्तु चरागाहों को नुकसान न पहुंचायें यह प्रबन्ध करना। जहां पशुओं के पीने का जल न उपलब्ध हो, वहां उसका प्रबन्ध करना और तालाब तथा कुएं बनवाना इसी विभाग के कार्य थे। जंगल की सड़कों को ठीक रखना, व्यापारियों के माल की रक्षा करना, काफिलों को डाकुओं से बचाना तथा शत्रुओं के हमलों की सूचना राजा को देना, यह सब कार्य विवीताध्यक्ष के सुपुर्द थे।
सेतुः
पुष्पों और फूलों के उद्यान, शाक के खेत और मूलों (मूली, शलगम, कन्द आदि) के खेतों से जो आय होती थी, उसे सेतु कहते थे।
Author: Amit Rajpoot
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