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जी हां, नसरुद्दीन शाह की फिल्म ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ तो आपको याद ही होगी। साल 1980 में आई इस फिल्म के जरिए सिस्टम के सताए आम आदमी के गुस्से को जगजाहिर किया गया था। ऐसे अलग तरह की इस कहानी के चलते ये फिल्म काफी सराही गई थी। अब एक बार फिर नये कलेवर में दर्शकों के सामने ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ हाजिर है, जिसमें मानव कौल और नंदिता दास जैसे दिगग्ज कलाकार मुख्य भूमिकाओं में हैं। हालांकि समय के हिसाब से इसकी कहानी और पृष्ठभूमि में परिवर्तन किया गया है। तो चलिए जानते हैं कि आखिर मानव कौल की ये फिल्म नसरुद्दीन शाह की ओरिजनल फिल्म ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ से कितनी अलग या बेहतर है।
दरअसल, ओरिजनल फिल्म में जहां मज़दूर तबके से आने वाले नायक की अपने आसपास के सामाजिक और राजनीतिक तंत्र से नारजगी दिखती है, वहीं इसमें नायक वर्तमान दौर में सिस्टम के भष्ट्रचार से पीड़ित है। फिल्म की कहानी कुछ इस तरह है कि सामान्य सी जिंदगी जी रहे अल्बर्ट पिंटो (मानव कौल) के जीवन में भूचाल तब आता है, जब उसके झूठे भ्रष्टाचार के आरोप में सस्पेंड कर दिए जाते हैं और इससे दुखी होकर वो खुदकुशी कर लेते हैं। ऐसे में सिस्टम में मौजूद भष्टाचार के प्रति अल्बर्ट का गुस्सा इस कदर भड़क उठता है कि वो इसका बदला लेने निकल पड़ता है। वहीं इधर उसकी गर्लफ्रेंड स्टेला (नंदिता दास) उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाती है।
यानी कि दोनों ही फिल्मों में आम इंसान की हताशा और बेबसी को दिखाया गया है। पर समय के हिसाब से फिल्म के ट्रीटमेंट में काफी बदलाव है।
कलाकारों की बात करें तो जहां नसरुद्दीन शाह ने जहां अपने संजीदा अभिनय के जरिए अल्बर्ट को दर्शकों के दिलों में उतार दिया था। वहीं ने भी आज के दौर में अलबर्ट को जीवंत करने की भरपूर कोशिश की थी। मानव के साथ ही नंदिता दास और सौरभ शुक्ला जैसे मझे हुए कलाकारों का अभिनय इस फिल्म में जान डालता है।
हालांकि अगर आप ओरिजनल फिल्म के दिवाने हैं तो शायद ये फिल्म आपको खल सकती हैं, क्योंकि असल में इसका स्क्रीनप्ले थोड़ा कमजोर है। ऐसे में हिट कहानी और दिग्गज कलाकारों के बावजूद ये फिल्म थोड़ी ढ़ीली है। निर्देशक के तौर पर सौमित्र रानाडे की कोशिश की सराहना करनी चाहिए, पर वो मूल फिल्म की श्रेष्ठता नहीं छू पाए हैं।
Author: Yashodhara virodai
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