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रोजगार के लिए आज देश का युवा दर-दर ठोकर खा रहा है। इसके अलावा रोजगार देश में हमेशा से एक कंट्रास मुद्दा रहा है, लेकिन आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि भारत की शास्त्रीय व्यवस्था में कभी भी रोजगार के लिए न तो संघर्ष मिलता है और न ही विमर्श। इसका सबसे बड़ा कारण था युवाओं की शिक्षा व्यवस्था का सराकार होना। जी हाँ, आज के समय में हमारी शिक्षा वयवस्था ही युवाओं में रोजगार की कमी का सबसे बड़ा कारण हैं। इसलिए रोजगार की समस्या को दूर करने के लिए सबसे बड़ा सवाल ये है कि हम अपनी शिक्षा पद्धति के पुनर्जीवन के लिए क्या कर पा रहे हैं।
आपको बता दें कि शास्त्र के कुछ अंश पाठ्यक्रमों में डाल देने से या फिर संस्कृत में बच्चों से दो चार नाटिका मंच पर प्रस्तुत करवा लेने से हमारी खोई हुई भारतीयता लौट कर नहीं आएगी और न ही जनमानस में इसका कोई परिवर्तन ही होगा। प्रत्येक व्यक्ति को बचपन में यही सिखाया जाता है कि सदा सत्य बोलिये। लेकिन क्या कारण है कि इस वाक्य को अर्थ सहित रटने के बाद भी देश में झूट की भरमार हैं। भ्रष्टाचार अपनी उचाई पर है।
वास्तव में रोजगार की समस्या को समझने के लिए हमें और भी गहरी जड़ों में जाना चाहिए। इसके लिए हमें अपने शात्रीय समाज की तरफ़ दृष्टिपात करना होगा। हमें यह सोचना होगा कि क्या भारतीय शिक्षाव्यवस्था किताबी थी? क्या सबके लिए समान और हार्ड एंड फ़ास्ट सिलेबस था? क्या हमारे ऋषि प्रत्येक विद्यार्थी को एक ही डायस से तैयार कर निकालना चाहते थे? श्रुति परंपरा में किस बात को ज़्यादा ध्यान दिया जाता था? परीक्षा में अर्जित अंकों को या चरित्र को? कर्म व कौशल को या संज्ञा रटाई को? रोजगार की समस्या का हल ढूँढ़ने के लिए हमे इन सब बातों पर भी विचार करना होगा, ताकि हम अपनी आने वाली नस्लों को यथार्थ में कुशल बना सकें न कि महज निष्णात के प्रमाण पत्र पर।
Author: Amit Rajpoot
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