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समय बदलता है तो उसके साथ बहुत सारी चीज़ें बदलती हैं, मसलन सभ्यता, वातावरण, परिवेश और ख़ासा वक़्त बीतने पर भूगोल भी। इस प्रकार इन तमाम चीज़ों के बदलने के साथ हमारा पर्यावरण भी बदलता है। ऐसे में यदि हम अपने लिए रहने को घर बनाए तों ज़ाहिरन हमें ऐसा घर बनाना चाहिए जो कि हमारे पर्यावरण के अनुकूल हो। आपको बता दें कि किसी भी जगह पर घर बनाने के पीछे दो कारम सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। पहला, वहाँ का पर्यावरण और दूसरा वहाँ का भूलोग। इन्हीं दो बातों को ध्यान में रखकर ही हमें अपने घर का निर्माण करना चाहिए।
लेकिन खेद इस बात का है कि आज हमारे समाज में कुछ ऐसा चलन है कि बनारस में घर बनवाने वाला कोई शख़्स राजस्थान के संगमरमर से घर बनवाता है। वैसे ही किसी तराई में घर बनवाने वाला शख़्स चुनार के पत्थरों से घर बनवाता है। वास्तव में घर बनाने की यह पद्यति बिल्कुल भी ठीक नहीं है। महात्मा गाँधी के विचारों में आदर्श गाँव में कोई आदर्श मकान वह होगा जो वहाँ पाँच मील के दायरे में उपलब्ध हो। सच में ये सब वाकई बहुत ही प्रेरणादाई है और आज हम जब अपने चारो ओर देखते हैं तो ऐसा लगता है कि मानों शहरी क्षेत्रों में भवन निर्माण में अवशेषों और मलबों के भी इस्तेमाल की ज़रूरत है। दिलचस्प है इसे हक़ीक़त में बदलकर रख दिया है केरल के युवा आर्किटेक्ट वीनू डेनियल ने।
वीनू डेनियल महान आर्किटेक्ट लॉरी बेकर के जीवन से काफी प्रभावित हुये हैं। उन्होंने पर्यावरण के अनुकूल घर बनाने और अवशेषों के इस्तेमाल को लेकर भवन निर्माण के लिए साल 2007 में ‘वॉलमेकर्स’ नाम से एक कंपनी बनायी है। आपको बता दें कि वीनू डेनियल मलबों में पड़ी मिट्टी की ईंटों, बीयर की ख़ाली बोलतों और ऐसी ही अन्य उपलब्ध चीज़ों से बेहतरीन और पर्यावरण के अनुकूल घर बनाते हैं। दिलचस्प है कि वीनू डेनियल इस विधि से कई कॉटेज बना चुके हैं।
Author: Amit Rajpoot
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