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फिल्म इंडस्ट्री और राजनीति दोनो ही पूरी तरह तरह से अलग-अलग क्षेत्र हैं, हां लेकिन दोनो का अपना आकर्षण और जलवा देखने को मिलता है। यही वजह है कि फिल्मों में हिट होने के साथ ही फिल्मी सितारें अक्सर राजनीति की तरफ रूख कर लेते हैं। इस लोकसभा चुनाव में भी कई सितारें मैदान में उतर चुके हैं। हालांकि पिछले रिकार्ड की बात की जाए तो फिल्मों में सुपरहिट होने के बावजूद कई फिल्मी सितारें पॉलिटिक्स में बुरी तरह से फ्लॉप साबित हुए हैं।
जी हां, इस लिस्ट में 60-70 के दशक के दिग्गज अभिनेता देवानंद से लेकर हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन तक शामिल हैं। आज हम आपको ऐसे ही कुछ फिल्मी सितारों के बारे में बता रहे हैं जिन्हें राजनीति की दुनिया रास नहीं आई।
देवानंद ने बनाई थी अपनी पार्टी
जी हां, अभिनेता देवानंद ने तो अपनी राजनीतिक पार्टी ही बनाई थी। दरअसल, ये बात साल 1975 के इमरजेंसी के दौर की है, जब कांग्रेस सरकार की सख्ती से पूरा देश हिल गया था। ऐसे में जब आपातकाल के बाद 1977 में चुनाव आए तो फिल्मी सितारों ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने के लिए जनता पार्टी को सपोर्ट किया। पर जनता पार्टी की सरकार बनने पर जब फिल्म बिरादरी की अपेक्षित मांगे पूरी नहीं हुई तो इंडस्ट्री के लोग काफी हताशा हुए। जिसके चलते साल 1979 में जनता सरकार के पतन के बाद बॉलीवुड ने अपने खुद का एक राजनीतिक दल का गठन करने का फैसला किया।
ऐसे में देवानंद की अध्यक्षता में फिल्म इंडस्ट्री के लोगों ने अपनी खुद का राजनीतिक दल ‘नेशनल पार्टी’ जिसमें मशहूर फिल्मकार वी.शांताराम, जीपी सिप्पी, श्री राम बोहरा, आईएस जोहर, रामानंद सागर, आत्माराम के साथ ही शत्रुघन सिन्हा, धर्मेंद्र, हेमामालिनी, संजीव कुमार जैसे नामी सितारे भी शामिल हुएं।
फिल्मी सितारों की इस पार्टी का मुख्यालय वी. शांताराम के राजकमल स्टूडियो में बनाया गया। वैसे आमतौर पर इसका सक्रिय संचालन देवानंद के दफ्तर से ही होता था। वैसे 'फिल्म वालों की पार्टी में सबका स्वागत है' वाली बात ने उस दौर में देश के नौजवानों को काफी आकर्षित किया और लोग इस फिल्मी पार्टी में अपनी रूचि दिखाने लगें। जिससे जनता पार्टी और कांग्रेस को चिंता में डाल दिया।
इस तरह नेशनल पार्टी की बढ़ती लोकप्रियता ही उसके अस्तित्व की दुश्मन बन गई । जनता सरकार और कांग्रेस के बड़े नेताओं की तरफ रामानंद सागर, जीपी सिप्पी जैसे मशहूर फिल्मकारों को नसीहत दी गई कि अगर फिल्म इंडस्ट्री को बचाना है तो वे इस ‘तमाशे’ को बंद कर दें। ऐसे में सियासती ताकतों से मिल रही इस धमकियों के चलते नेशनल पार्टी से कई कलाकार किनारा करने लगे । आखिर में देवानंद लगभग अकेले ही रह गए। इसलिए उन्होंने भी नेशनल पार्टी के विचार को खत्म करने में अपनी भलाई समझी। इस तरह से फिल्मी कलाकारों के ये राजनीतिक मुहीम और उनकी बनाई गई ये पार्टी शुरू होते ही खत्म हो गई।
महानायको को भी रास नहीं आई राजनीति
बॉलीवुड में अमिताभ बच्चन का कद जितना बड़ा है, राजनीति के क्षेत्र मे उनका करियर उतना ही छोटा रहा है। दरअसल, साल 1984 में अमिताभ बच्चन ने अपने फैमिली फ्रेंड राजीव गांधी को सपोर्ट करने के लिए राजनीति में एंट्री की थी। अमिताभ बच्चन कांग्रेस के टिकट पर इलाहाबाद से चुनाव लड़ा और जीता भी, पर बोफोर्स घोटाले की चिंगारी ने अमिताभ और गांधी परिवार के रिश्ते में आग लगाने के साथ ही अमिताभ के राजनीतिक करियर को भी स्वाहा कर दिया। बोफोर्स मामले में अपना नाम आते ही अमिताभ ने इस्तीफा दे दिया और 'राजनीति मेरे लिए नहीं बनी है' जैसे बयान के साथ ही राजनीति से हमेशा के लिए किनारा कर लिया।
राजेश खन्ना का भी हुआ राजनीति से मोहभंग
बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना ने भी राजनीति की दुनिया में हाथ आजमाया पर जल्द ही इससे उनका मोहभंग भी हो गया। राजेश खन्ना ने कांग्रेस की तरफ से नई दिल्ली सीट से 1992 से 1996 सांसद रहे । लेकिन इसेक बाद जब उनका राजनीति से मोहभंग हुआ तो उन्होनें एक्टिव पॉलिटिक्स से दूरी बना ली... हालांकि राजेश खन्ना अंत समय तक कांग्रेस के एक्टिविस्ट के तौर पर काम करते रहे।
संजय दत्त का राजनीतिक सफर भी रहा उतार-चढाव भरा
जी हां, अपने नीजि जिदंगी में कई उतार-चढ़ाव का सामना कर चुके संजय दत्त का राजनीति करियर भी मुश्किल से भरा रहा। 2009 लोकसभा चुनाव में अमर सिंह के कहने पर संजय दत्त ने समाजवादी पार्टी से चुनाव लडऩे का मन बनाया, पर उस दौरान कोर्ट की तरफ से उन्हें बरी ना किए जाने के चलते उन्होंने अपना नामांकन वापस ले लिया। ऐसे में समाजवादी पार्टी ने उन्हें आननफानन में महासचिव बना दिया। लेकिन तमाम विवादों के चलते 2010 के आखिर में संजय ने अपने पद से इस्तीफा देकर राजनीति से किनारा करना ही बेहतर समझा।
Author: Yashodhara Virodai
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