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कई दिनों के विहार के बाद भगवान बुद्ध मगध की राजधानी राजगृह से प्रस्थान करने वाले थे। लोंगों को जब ये पता चला तो वह उनके लिए भेंट आदि लेकर उनके दर्सन के लिए आने लगे। अपने अनेक प्रवर्तकों और शिष्यों के साथ भगवान बुद्ध लोगों की भेंट को स्वीकार कर रहे थे। इसी क्रम में मगध के सम्राट बिम्बिसार ने भी उन्हें भूमि, वस्त्र और वाहन आदि प्रदान किये। इसके अलावा नगर के सेठों ने भी उन्हें धन-धान्य और स्वर्ण के आभूषण भगवान बुद्ध के चरणों में समर्पित किये। सभी के दान को स्वीकार करने के लिए भगवान बुद्ध अपना दाँया हाथ उठाकर स्वीकृति इंगित कर देते थे। इसी भीड़ में वृद्ध औरत भी थी।
वह वृद्ध और भगवान बुद्ध से बोली, हे बुद्ध! मैं बहुत ही निर्धन हूँ। मेरे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है। हालांकि आज मुझे एक पेड़ से गिरा हुआ आम मिल गया है, जिसे मैं का ही रही थी कि मैंने आपके प्रस्थान करने का समाचार सुना। उस समय तक मैं इसे आधा खा चुका थी। यद्यपि मैं आपको कुछ अर्पित करना चाह रही थी, लेकिन मेरे पास इस आधे खाये हुए फल के सिवाय कुछ और नहीं है। इसे ही मैं आपको भेंट करना चाहती हूँ।
उस वृद्धा के निवेदन पर वहाँ उपस्थित सभी साहूकार, सेठ राजा और अन्य धनी लोगों ने देखा कि भगवान बुद्ध अपने स्थान से खड़े हो गये और चलकर उस वृद्धा के पास पहुँचे और दोनों हाथों से स बुढ़िया के आधे फल को प्रेम से स्वीकार कर लिया। ऐसे में सम्राट ने चिंतित होकर कहा कि हे बुद्ध! हम सभी की भेंट को आपने केवल हात हिलाकर ही स्वीकार किया जबकि इस वृद्धा के लिए आप अपने स्थान से उठकर दोनों हाथों को फैलाकर भेंट लेने चले आये।
बुद्ध मुस्कुराए और बोले- देखो, इस वृद्धा ने अपना सर्वस्व मुझे दान किया है जबकि आप लोगों ने अपनी पूँजी का कुछ हिस्सा ही मुझे दिया है, जिसका आप लोगों को भान और अभिमान दोनो है। ऐसे में वृद्धा के विरल महादान के सम्मान में मुझे अपने स्थान से उठना ही पड़ा। भगवान बुद्ध की बातें सुनकर वहाँ उपस्थित सभी लोगों को दान का मतलब समझ आ गया।
Author: Amit Rajpoot
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