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शाकाहार व मांसाहार की बहस से दूर स्थान बदलने पर हमारी डिशेज़ में बदलाव आ जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि दुनिया में प्राकृतिक और भौतिक विभाजन के आधार पर अलग-अलग वातावरण तैयार होता है। ऐसे में हमारा भोजन और रहन-सहन भी इस वातावरण के अनुरूप होगा। मसलन जो भोजन तराई और मध्य भारत में तामसिक है, वही भोजन हिमालय के उच्च श्रेणिक स्थलों पर जीवन रक्षण का बेहतर साधन है। पूर्व में जहाँ अत्यधिक बारिश और जलप्लवन के कारण शाक और मूल को भोजन का हिस्सा बनाना सहज नहीं है, ऐसे में जल से मिलने वाला भोजन ही उनका जीवन रक्षण करता है। हालांकि दलहनी इलाक़ों में रहने वालों के लिए यही शाक और मूल उनके भोजन का मुख्य आधार होता है। यहाँ के लोगों के लिए मांस-मछली वर्जित होती है।
इस प्रकार सच पूछिए तो खाद्य और अखाद्य के विश्लेषण कहीं शास्त्रों में नहीं मिलते हैं। जहां तक शास्त्रों में पालतू पशुओं के वध को निषिद्ध किया गया है, उसका कारण उनसे होने वाले लाभ बताएं गए हैं। आयुर्वेद में भी भोजन के नियम स्वास्थ्य के साथ-साथ वातावरण के अनुरूप तय किए गए हैं लेकिन स्थान परिर्वतन पर उन्हें परिर्वतनीय बताया गया है। वैसे भी वहां यह स्पष्ट किया गया है कि आपके निवास स्थान के बीस कोस के दायरे में होने वाले पदार्थ ही खाने योग्य हैं।
इस प्रकार सच पूछिए तो खाद्य और अखाद्य के विश्लेषण कहीं शास्त्रों में नहीं मिलते हैं। जहां तक शास्त्रों में पालतू पशुओं के वध को निषिद्ध किया गया है, उसका कारण उनसे होने वाले लाभ बताएं गए हैं। आयुर्वेद में भी भोजन के नियम स्वास्थ्य के साथ-साथ वातावरण के अनुरूप तय किए गए हैं लेकिन स्थान परिर्वतन पर उन्हें परिर्वतनीय बताया गया है। वैसे भी वहां यह स्पष्ट किया गया है कि आपके निवास स्थान के बीस कोस के दायरे में होने वाले पदार्थ ही खाने योग्य हैं।
इस प्रकार प्रकृति ने मानव को खाने के लिए जो भी उपलब्ध कराया है उसे परिस्थितियों और प्रकृति के अनुसार खाना चाहिए। इसमें मांसाहार और शाकाहार का कोई प्रस्न ही नहीं उठता है कि इंसान को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति के लिए मांसाहार खाना सहज हो जाता है। ध्यान रहे कि दलहनी इलाक़े में रहकर आपके लिए मांस खाना ग़लत होगा, यहाँ आपको शाक और मूल पर ही निर्भर रहना चाहिए। यही प्राकृतिक भोजन पद्यति है।
Author: Amit Rajpoot
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