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भारत में लोकतंत्र के मन्दिर यानी कि संसद भवन की विशिष्ट काया पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करती है। इसकी भव्य बनावट और विशेष आकृति को देखकर कोई भी बिना आकर्षित हुये नहीं रह सकता है। लेकिन आपको बता दें कि भारतीय संसद की इस बनावट को लेकर देश-दुनिया में दो मत प्रचलित हैं। पहला मत यह मानता है कि संसद भवन का परिसर मध्य प्रदेश के भिण्ड-मुरैना में स्थित चौंसठ योगिनी मन्दिर की हू-ब-हू प्रतिकृति है, तो दूसरा मत यह भी प्रचलित है कि भारतीय संसद यूरोप की रोमन वास्तुकला से काफी प्रभावित है। हालांकि इस बारे में आगे स्पष्ट मत भी प्रस्तुत किये गये हैं।
ग़ौरतलब है कि यद्यति एक वर्ग जो यह मानता है कि रायसीना हिल पर निर्मित भारतीय सत्ता के केन्द्र के रूप में संसद भवन, राष्ट्रपति भवन और नॉर्थ ब्लॉक व साउथ ब्लॉक का वास्तुशिल्प यूरोप की रोमन वास्तुकला से प्रभावित है, वे लोग यह भी स्वीकार करते हैं कि इंपीरियल दिल्ली (नई दिल्ली) के शिल्पकार एडवर्ड लुटियन और हर्बर्ट बेकर की जोड़ी ने इसके डिजाइन में भारतीय और पश्चिमी वास्तुकला के मिश्रण की साफ़ झलक पेश की है। हालांकि भारतीय पुरातत्ववेत्ता इसे नकारते हैं।
भारत के वरिष्ठ पुरातत्ववेत्ता मोहम्मद की मानें तो संसद भवन का डिज़ाइन पूरी तरह से चौंसठ योगिनी मन्दिर से ही प्रभावित है। वास्तव में संसद भवन की दीवारों पर अंकित वैदिक मंत्र इस बात के प्रमाण हैं कि इसके वास्तुशिल्प में ब्रिटिश वास्तुकारों ने भारतीय भवन निर्माण कला का पूरा ध्यान रखा।
बहरहाल, आपको बता दें कि चंबल घाटी के दुर्गम इलाक़े में महज 4-5 किमी. के दायरे में बसे दो गाँव मितावली और पढ़ावली में एक हज़ार साल से भी अधिक पुराने ऐतिहासिक महत्व के विरासत स्थल मौजूद हैं। इन्हीं में से एक है चौंसठ योगिनी मन्दिर। चौंसठ योगिनी मन्दिर का निर्माण आज से 696 साल पहले 1323 ई. में राजा देवपाल ने तंत्र साधना के शिक्षा केन्द्र के रूप में कराया था।
Author: Amit Rajpoot
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