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प्राचीन काल में विधि शास्त्रों में मौजूद क़ानून सभ्यता संयत और ज़ुर्म की प्रकृति और जटिलता के अनुरूप दण्ड का विधान रखते थे। इसलिए हर ज़ुर्म करने वाला कोई भी अपराध करने से पहले उसके एवज में मिलने वाले दण्ड के बारे में सोचकर घबरा जाता था और ज़ुर्म से दूर ही रहता था। प्रचीन काल की जो सबसे बेहतर बात है वह यह है कि विधि शास्त्रों में मौजूद हरेक क़ानून में अमल बहुत ही सहज और साफ़गोई के साथ होती थी। इसका परिणाम यह था कि न्याय व्यवस्था बहुत ही अच्छी और लचीली थी। इस क्रम में यदि हम बात करें प्राचीन काल में रेप के आरोप के बाद मिलने वाली सज़ा पर तो इस बारे में अलग-अलग काल में अलग-अलग विधि शास्त्रियों के भिन्न विधान हैं।
आपको बता दें कि सम्राट अशोक ने भी अपने चतुर्थ स्तंभ लेख में व्यवहार संहिता और दंड संहिता में शुद्ध चरित्र और धर्म के साथ सद्व्यवहार के विपरीत अपराध करने वाले दोषियों के दोष व उनके अपराधों को कम करने का प्रयास किया था। वास्तव में हत्या के बाद जो सबसे जघन्य अपराध माना जाता है वह दुष्कर्म या रेप ही है। इस अपराध के लिए प्राचीन विधि शास्त्रियों ने कड़ी से कड़ी सज़ा की व्यवस्था की थी। इसमें सबसे पहले देवताओं के गुरु वृहस्पति ने रेप के अपराधी का सिर मुँड़वाकर उसे गधे में बिठाकर लज्जित करने का दण्ड निर्धारित किया था।
मनु स्मृति के अनुसार यह कहा गया है कि यदि कोई भी व्यक्ति रेप जैसे कृत्य को अंज़ाम देता है तो उसे 1000 मुद्राओं का अर्थ दण्ड देने के साथ-साथ उसके माथे पर चिह्न अंकित कर उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जायेगा। वेद ब्यास के शिष्य याज्ञ्यवल्क्य ने को रेप के आरोपी की सारी सम्पत्ति हड़प किये जाने और अपराधी को प्राणदण्ड दिये जाने की बात कही थी। कुछ ऐसी ही बात चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में कही है कि ऐसे अपराधी की सम्पत्ति हड़पकर उसे अग्नि में जला दी जाये और अपराधी को आजीवन यातनाओं में रखा जाये।
Author: Amit Rajpoot
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