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अंग्रेज़ जब भारत आये तो उनके पास बहुत ज़्यादा धन नहीं था, मसलन इतना तो नहीं कि वो भारत को ग़ुलामी की जंज़ीरों में बाँध लेते। यद्यपि उन्हें अपना व्यापार बढ़ाने और उसे गति देने के लिए कई सारे संसाधनों की आवश्यकता थी। इनमें से ही एक आवश्यकता थी रेल-वे के निर्माण और कई सारे पुलों की। ऐसे में इसके निर्माण के लिए अंग्रेज़ों के पास धन नहीं था और न ही अपने सामानों की विधिवत मार्केटिंग के लिए ही उनके पास धन पर्याप्त था कि वह अपने बिजनेस को अखिल भारत में फैला सकें। इसके लिए अंग्रेज़ों ने पहले तो अपने देश के सामने इस समस्या को रखा कि भारत जैसे विशाल देश में इस तरह का निर्माण करना काफी खर्चीला और ब्रिटेन जैसे देश के बस की बात नहीं थी। लिहाजा उन्होंने इसका हल भारत में ही ढूढ़ना चाहा।
इसके लिए उन्होंने भारत के राजाओं से कर्ज़ लेने का प्लान बनाया और उनको लालच दिया कि यदि आप हमें धन दोगे तो हम भारत में विकास और तकनीकी लायेंगे। हालांकि इसके पीछे अंग्रेज़ों की अधिनायकवादी चाल छुपी थी, जिसे भारतीय राजा समझ न सके थे। परिणाम स्वरूप भारत को यही देखने को मिला की अंग्रेज़ इसी रेल-वे के दम पर पूरे भारत को सहजता के साथ लूट ले गये।
बहरहाल, इसी का परिणाम था कि जब अंग्रेज़ों ने मध्य प्रदेश के इंदौर में जब रेल लाईन बिछाने की योजना बनाई तो इंदौर के राजा महाराजा तुकोजीराव होलकर द्वितीय ने अंग्रेज़ों को लगभग एक करोड़ रुपये 101 साल के लिए कुछ 4 प्रतिशत की ब्याज से दिया था। इतना ही नहीं, महाराजा तुकोजीराव होलकर द्वितीय ने अंग्रेज़ों को रेल लाईन बिछाने के लिए ज़मीन भी फ़्री में दी थी। बहरहाल, अंग्रेज़ों द्वारा भारत को बेवकूफ बनाने के क्रम में राजा तुकोजीराव होलकर द्वितीय का नाम सबसे आगे माना जाता है, क्योंकि इनके द्वारा ही दिये गये धन के बदौलत अंग्रेज़ फूले नहीं समाते थे।
Author: Amit Rajpoot
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