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भारतीय सिनेमा ना सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में लोकप्रिय हो चला है, वहीं उद्योग के रूप में तो भारतीय सिनेमा, दुनिया की सबसे समृद्ध फिल्म इंडस्ट्री मानी जाती है। आज भारतीय सिनेमा की व्यवसायिक और कलात्मक दोनो तौर पर दुनिया में नाम कमा रही है और भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का श्रेय जाता है महान फिल्मकार सत्यजीत रे को। जी हां, सत्यजीत रे वो शख्स थे जिनके प्रयासों के चलते इंडियन सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। आज सत्यजीत रे के जन्मदिवस के मौके पर हम आपको उसके जीवन सफर और सिनेमा में योगदान के बारे में बता रहे हैं।
सत्यजीत रे का जन्म 2 मई 1921 में कोलकत्ता में हुआ था और जब वो सिर्फ तीन साल के थें, तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। ऐसे में उनकी मां सुप्रभा ने कई सारी दिक्कतों का सामना करते हुआ उनका लालन पालन किया और इन्ही संघर्षो से सत्यजीत रे के अंदर जन्मा कलाकार।
सत्यजीत रे को चित्रकला में काफी रूचि थी, ऐसे में उन्होने अपने करियर की शुरुआत ग्राफिक डिजाइनर के तौर पर की थी। जहां उन्होंने कई सारे किताबों के कवर पेज डिजाइन किए और इन्ही किताबों में से एक थी जिम कार्बेट की मैन इट्स ऑफ कुमाऊं और जवाहर लाल नेहरु की डिस्कवरी ऑफ इंडिया शामिल है।
इसके साथ ही सत्यजीत रे ने विभूतिभूषण बंधोपाध्याय के मशहूर उपन्यास 'पाथेर पांचाली' का बाल संस्करण अम अंतिर भेपू (आम के बीज की सीटी) को तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। इसके लिए उन्होने किताब के कवर के साथ क और मशहूर शॉट्स बने।
साल 1950 में उन्हें अपनी कंपनी की तरफ से लंदन जाने का मौका मिला, जहां उन्होंने विदेशी भाषा की फिल्में देखी। ऐसी फिल्मों को देखकर सत्यजीत रे काफी प्रभावित हुए और इसी दौरान उनकी मुलाकात फ्रांसिसी फिल्म निर्देशक जॉ रन्वार से हुई। ऐसे में लंदन के इस प्रवास के दौरान ही उन्हें फिल्म मेकिंग का शौक लगा और उन्होंने तय कर लिया कि भारत आकर वो 'पाथेर पांचाली' पर फिल्म बनाएंगे।
ऐसे में कुछ लोगों ने सत्यजीत रे के सामने मदद की पेशकश की, पर वो इसके बदले में फिल्म में अपने हिसाब से कुछ बदलाव चाहते थे, जिसके लिए रे तैयार नहीं हुए । आखिर में पश्चिम बंगाल सरकार ने सत्यजीत रे की मदद की और फिर साल 1955 में पर्दे पर आई 'पाथेर पांचाली' परदे पर आई, जिसनें दर्शको के साथ ही फिल्म समीक्षको का भी दिल जीत लिया।
ये फिल्म कोलकत्ता के कई सिनेमा हालों में हफ्तो तक हाउस फुल चलती रही। जबरदस्त कमाई के साथ ही इस फिल्म ने कई राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय पुरस्कार भी जीते। जिसमें फ्रांस के कांस फिल्म फेस्टिवल में मिला विशेष पुरस्कार बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट भी शामिल है। अब बात करते हैं ऑस्कर अवॉर्ड की, तो आपको बता दें कि फिल्म जगत का सबसे प्रतिष्ठित ऑस्कर अवॉर्ड सत्यजीत रे के पास खुद चलकर आया था।
असल में, साल 1992 में सत्यजीत रे को ऑस्कर (ऑनरेरी अवॉर्ड फॉर लाइफटाइम अचीवमेंट) देने की घोषणा हुई, पर उस वक्त वो काफी अस्वस्थ चल रहे थे और इसलिए वो ये अवॉर्ड लेने अमेरिका नहीं जा सकते थे। ऐसे में ऑस्कर के तत्कालीन पदाधिकारियों ये ये फैसला लिया कि अवॉर्ड उनके पास पहुंचाया जाएगा और फिर पदाधिकारियों की एक टीम कोलकाता में सत्यजीत रे के घर पहुंची, जहां उन्हें इस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
हालांकि इस तरह अवॉर्ड मिलने के सिर्फ एक महीने के भीतर ही सत्यजीत रे का दिल का दौरा पड़ने की वजह से निधन हो गया और इस तरह उनके साथ ही सिने जगत के युग का अंत हो गया। हालांकि भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को हमेशा याद किया जाता रहेगा।
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