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हमारे देश में शिक्षा की ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें सरकार का कम से कम हस्तक्षेप रहता था। गुरुकुल व्यवस्था थी, जिसमें राजाओं के पुत्र भी पढ़ा करते थे बावजूद इसके राजघरानों का तनिक हस्तक्षेप विद्यालयों अथवा गुरुकुलों में नहीं रहता था। हालांकि आज शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर एकदम से उलट दिखती है। सरकार की शिक्षा पर पूरा दखल है। जबकि शिक्षा पर शासन के हस्तक्षेप की भूमिका को तय करना आज के समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है। वास्तव में विद्यालय तो गैरसरकारी ही होने चाहिए। सरकार केवल इतना सुनिश्चित करे कि शिक्षा का व्यवसायीकरण न हो। इसके कई उपाय किये जा सकते हैं।
वास्तव में यह एक दुष्चक्र है। इसका समाधान एक ही है, शिक्षक का तप। जी हाँ, शिक्षक तप करें। ऊँचे वेतन लेना बंद करें। राज्य उनका ध्यान रखे और उपहार दे। धन-धान्य प्राप्त कर लेने वाले शिक्षक यदि उसे लेते हैं तो सादा और अपरिग्रही जीवन बनाए रखें। ग़रीब छात्रों की शिक्षा और संपोषण की जिम्मेदारी शिक्षक उसी धन-धान्य से लेवें। आज ये बात सुनने में आपको अजीब ज़रूर लग सकती है कि सारा बोझ अध्यपाक पर ही आ जायेगा। वास्तव में ये सब बहुत ही आसान हो जाएगा, जब शिक्षक राज्य का कर्मचारी अथवा सरकारी नौकर नहीं कहलाएगा। शिक्षक को समाज ही महान बनाता है। इतिहास गवाह है कि गुरुकुल के आचार्य कभी छात्रों का पालन-पोषण करते थे, जबकि आज छात्रों से शुल्क लेकर वो स्वयं अपना पालन-पोषण करते हैं।
आज के हालात सिद्धांततः बड़े गड़बड़ हैं। आज तो शिक्षक भी राज्य कर्मचारी ही है, वे शिक्षक हैं कहां? सरकारी विद्यालय राज्य के केंद्र हैं, शिक्षा के नहीं। इसलिए शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए ज़रूरी है कि हमारे देश में ग़ैर-सरकारी विद्यालयों की स्थापना हो और सरकार का शिक्षा व्यवस्था में महज इतना ही रोल रहे कि वह अनुदान और प्रोत्साहन करते रहें, न कि शिक्षकों को अपना नौकर बनाकर रखें।
Author: Amit Rajpoot
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