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जैसा कि लोकतंत्र के तीन स्तम्भ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद अब मीडिया को भी चौथे स्तम्भ के रूप में मान्यता मिल चुकी है। पर अभी भी चारों को बीच संमजस्य में काफी कमी है... खासकर मीडिया का बाकी तीनो अंगो से हमेशा मतभेद रहता है, ऐसे में प्रेस की आजादी को सम्मान देने के लिए विश्व स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 3 मई (1993) को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने की परम्परा शुरू की गई। इस कवायद में हर साल अलग अलग थीम के साथ इसे मनाया जाता है और इस बार की थीम है 'लोकतंत्र के लिए मीडिया: फर्जी खबरों और सूचनाओं के दौर में पत्रकारिता एवं चुनाव'।
वैसे देखा जाए तो ये थीम भारत के वर्तमान परिस्थितियों के लिए काफी सटीक बैठती है। देश में चल रहे चुनावी मौसम में जहां एक तरफ फर्जी खबरों का बाजार गर्म है, वहीं काफी हद तक प्रेस की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में इन दोनो के बीच जूझती रही है दुनिया।
आज के समय में देश की जहां अधिकांश मीडिया संस्थानों पर वर्तमान सरकार का पक्ष लेने के आरोप लग चुका हैं, वहीं कुछ संस्थानों को अक्सर सरकार विरोधी घारणा के लिए प्रतिरोध झेलना पड़ता है। ऐसे में दोनो की परिस्थितियों में सवाल उठते हैं मीडिया की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता पर।
वहीं बात करें चुनाव की तो ऐसे वक्त में मीडिया की भागीदारी जहां एक तरफ बढ़ जाती है, वहीं इसकी विश्वसनीयता भी अकसर सवालों के घेरे में रहती हैं। चुनाव के दौरान में मीडिया की भागीदारी और जवाबदेही इसलिए बढ़ जाती है, क्योंकि कोई भी लोकतंत्र विश्वसनीय जानकारी तक पहुंच के बिना पूरा नहीं है। पर इसके साथ ही खबरों की विश्वसनीयता तय करना भी जरूर है कि क्योंकि अज्ञानता से कहीं अधिक खतरनाक गलत जानकारी का होना और शायद यही वजह है कि इस बार विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के लिए ये थीम रखी गई है।
Author: Yashodhara Virodai
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