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भारतवर्ष में समृद्ध ऋषिकुल की परंपरा का ख़त्म होना भारतीयता के नष्ट हो जाने जैसा है। इसलिए हमें इस बात का भान होना अति आवश्यक है कि आख़िर हमारी भारतीय संस्कृति और उस सभ्यता से ज्ञान के केन्द्र गुरुकुलों का ख़ात्मा किस प्रकार से हो गया। हालांकि इससे पहले आपको बता दें कि गुरुकुलों का सर्वाधिक अनिष्ट आधुनिक इतिहास में हुआ है और इसे सबसे ज़्यादा कॉन्वेंट स्कूलों ने किया बर्बाद। जी हाँ, ग़ौरतलब है कि साल 1858 में जब Indian Education Act बनाया गया, तो इसकी ड्राफ्टिंग ब्रितानी शिक्षाशास्त्री लॉर्ड मैकाले ने की थी जिसका स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह अंग्रेजी की नकली और निकम्मी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी।
मैकाले ने इस क्रम में सबसे पहले यहाँ के समृद्ध ज्ञान के केन्द्र गुरुकुलों का निशाना बनाया। जी हाँ, उसने गुरुकुलों को ग़ैर-क़ानूनी घोषित किया। उनको मिलने वाली सहायता जो समाज की तरफ से होती थी वो ग़ैर-क़ानूनी हो गयी। इसके बाद संस्कृत भाषा को भी ग़ैर-क़ानूनी घोषित किया गया। ये सिलसिला यूँ चला कि देश के ऋषिकुलों व गुरुकुलों को भारत के गांव-गांव घूम-घूमकर ख़त्म कर दिया। उनमें आग लगा दी। उसमें पढ़ाने वाले गुरुओं को अंग्रेज़ी शासन में मारा-पीटा गया और फिर उन्हें जेल में डाला गया।
आँकड़ों को देखें तो साल 1850 तक इस देश में 7 लाख, 32 हजार गुरुकुल हुआ करते थे, जबकि उस समय इस देश में गाँवों की संख्या थी 7 लाख, 50 हजार। यानी कि इसका साफ़ मतलब है कि हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल पाठशाला थी। ध्यान रहे कि गुरुकुल का आशय महज प्राथमिक शिक्षा से नहीं होता था, बल्कि इन्हें आज की भाषा में ‘Higher Learning Institute’ के तौर पर आप समझ सकते हैं।
Author: Amit Rajpoot
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