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माह-ए-रमज़ान की शुरुआत हो चुकी है। मुस्लिम कैलेण्डर के हिसाब से यह उनका 9वाँ महीना है, जिसे वह सबसे पवित्र मानते हैं। आपको बता दें कि रमज़ान को हम रमदान के नाम से भी जानते हैं। रमज़ान के पवित्र महीने में कभी 29 तो कभी 30 दिन होते हैं। इस पवित्र महीने में चूँकि हम उपवास रखते हैं और उपवास को अरबी में ‘सौम’ कहा जाता है, इसीलिये इस मास को अरबी में ‘माह-ए-सियाम’ भी कहते हैं। इसके अलावा मालूम हो कि फ़ारसी में उपवास को रोज़ा कहते हैं, इसलिए रमज़ान को माह-ए-रोज़ा भी कहा जाता है। दिलचस्प है कि भारत के मुसलिम समुदाय पर फ़ारसी का प्रभाव ज़्यादा है, इसलिए रमज़ान के महीने में उपवास को रोज़ा कहने का चलन अधिक है।
आपको बता दें कि रमज़ान के महीने को नेकियों का मौसम भी कहा जाता है, जिसमें इबादत मुख्य धर्म माना जाता है। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक सन् 2 हिजरी में अल्लाह के हुक्म के मुसलमानों पर रोज़े फर्ज़ यानी कि ज़रूरी कर दिये गये। ऐसा इसलिए किया गया था, क्योंकि मुसलमानों का यह मत है कि इसी पवित्र रमज़ान के महीने की 27वीं रात शब-ए-क़द्र को कुर-आन का नुज़ूल यानी कि अवतरण हुआ था। ऐसे में तब से लेकर आज तक मुसलमान इस पावन महीने में रोज़े का फ़र्ज़ निभाता आ रहा है।
इसके अलावा ऐसा भी माना जाता है कि मोहम्मद साहब को साल 610 में लेयलत उल-कद्र के मौके पर पवित्र कुरान शरीफ का ज्ञान प्राप्त हुआ था। उसी समय से रमजान को इस्लाम धर्म के पवित्र महीने के तौर पर मानाया जाने लगा।
ग़ौरतलब है कि माह-ए-रमज़ान के मायने और मक़सद शेष अन्य महीनों से बिल्कुल ही अलग हैं। जी हाँ, आपको बता दें कि रमज़ान के महीने में ऊपर वाले द्वारा दी गयी हरेक चीज़ के लिए उसका शुक्र अदा किया जाता है। इस महीने दान पुण्य के कार्यों करने को प्रधानता दी जाती है। इसके साथ ही रमज़ान के महीने में इंसान को हर तरह की बुरी आदतों से दूर रहना चाहिए।
Author: Amit Rajpoot
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