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ब्रह्मचर्य योग के आधारभूत स्तम्भों में से एक है। ये दो शब्द ब्रह्म और चर्य यानी की मनुष्य के ज्ञान की प्राप्ति के लिए उपयुक्त जीवनचर्या को दर्शाता है। आपको बता दें कि ब्रह्मचर्य वैदिक वर्णाश्रमों में पहला आश्रम भी है, जो व्यक्ति के पच्चीस वर्ष की आयु तक रहता है। इस आयु तक विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए विद्या ग्रहण करनी होती है। तो योग में ब्रह्मचर्य का अर्थ आप यौन संयम को समझ सकते हैं। ग़ौरतलब है कि हर आश्रम में यौन संयम के अलग-अलग मायने होते हैं। यह भी बात समझने वाली है कि प्राचीन काल में छात्र अपने गुरू के यहाँ रहकर सावधानी के सात वीर्य की रक्षा करते हुए ब्राह्म प्राप्ति का ज्ञान प्राप्त करते थे, जिसके चलते-धीरे-धीरे ब्रह्मचर्य शब्द वीर्य रक्षा के अर्थ में बदल गया।
आज हमें इसी वीर्य रक्षा के बारे में सोचना चाहिए। जी हाँ, आपको ये बात समझना चाहिए कि वीर्य रक्षा ही जीवन है और वीर्य का नाश करना ही मृतत्यु का कारम है। इसलिए वीर्य रक्षा का विवाह से कोई तात्पर्य नहीं है। आप विवाह के उपरान्त भी यदि अपने वीर्य को धारा प्रवाह ढंग से नष्ट करते जाएँगे तो आप अपनी मृत्यु के उतने ही क़रीब आते जाएँगे। वीर्य रक्षा के प्रभाव से ही प्राचीन काल में लोग दीर्घजीवी, निरोगी, दृढ़ कल्पी, बुद्धिमान, तेजस्वी, बलवान और कांतिमय होते हैं।
आपको बता दें कि ब्रह्मचर्य के प्रभाव से ही लोग कम समय में अधिक विद्या सीख सकते हैं। लेकिन किसी भी प्रभाव का किया गया मैथुन आपके लिए बिना वीर्य स्खलन के वीर्य का नाश करता है या उसे कमज़ोर करता है। मैथुन में स्मरण, श्रवण, कीर्तन अथवा कथन, श्रृंगार, एकांत में स्त्रियों से बात करना आदि अनेक श्रेणियाँ शामिल होती हैं। इन सभी का पालन विवाह से पहले और विवाह के बाद भी करना चाहिए, इसलिए महज विवाह न करना भर ब्रह्मचर्य नहीं है।
Author: Amit Rajpoot
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