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सिंहभूम को आम चुनाव 2019 में एक ऐसे लोकसभा क्षेत्र के तौर पर चिह्नित किया गया है, जहाँ बच्चों के जीवन के लिहाज से स्थित सबसे ख़राब है। जी हाँ, आपको बता दें कि झारकम्ड की सिंहभूम लोकसभा सीट पर आगामी 12 मई को मतदान होने जा रहा है। यद्यपि चुनाव के चलते यहाँ अन्य लोकसभा क्षेत्रों की तरह राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक समीकरणों की बात होनी चाहिए। लेकिन वास्तव में यहाँ तो इन सबकी बजाये स्वास्थ्य और पिछड़ेपन को लेकर चर्चाएँ गर्म हैं। आपको बता दें कि ऐसा इसलिए है, क्योंकि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और टाटा ट्रस्ट द्वारा देश के विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों के बच्चों में बौनेपन, वजन की कमी, एनीमिया और उनमें कमज़ोरी के हालात पर किये अध्ययन में सिंहभूम को सबसे निचले पायदान पर रखा गया है।
इस स्टडी के बाद और उसके ख़ुलासे के बाद जो परिणाम सिंहभूम की झोली में आकर गिरा है उससे तो मानों यहाँ हड़कंप मच गया है। अब तो यह साफ़ दर्शाता है कि किस प्रकार अब तक क्षेत्र को अपना नेतृत्व देते आ रहे लोग अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में पूरी तरह से विफल रहे हैं और इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया है। ऐसे में सिंहभूम का हर आमोख़ास वोटर यह सोचने को मज़बूर है कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का जश्न आम चुनाव 2019 के रूप में मना तो रहे हैं, लेकिन क्या सिंहभूम के इन बच्चों के प्रति हमारे नेतृत्व की विफलता को राजनीति का मुख्य मुद्दा बनाया जा सका? शायद नहीं।
इससे लोग और भी ज़्यादा हताश और परेशान हैं। इसका जो सबसे बड़ा और मूल कारण लोगों को नज़र आया वह यह है कि आज हर नेता अपनी विचारधारा की पूँछ से ऐसा जा चिपका है कि मानवीय मूल्यों की उसे कोई क़दर नहीं है। वास्तव में नेताओं के इन सबसे ऊपर उठ जाना चाहिए, वरना भविष्य हैरान कर देने वाला होगा।
Author: Amit Rajpoot
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