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10 मई 1857, इतिहास को वो दिन जब देश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांति का ज्वार फूटा था। वैसे तो इससे पहले से ही ब्रिटीश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह के स्वर देश के कई हिस्सों में उठ रहे थे और पूरा देश इस दासता की जंजीरों को तोड़ने के लिए आतुर था, पर न तो इसके लिए कोई निश्चित समय नियत हो पा रहा था और न ही एकजुटता बन पा रही थी। इसी बीच आखिरकार मेरठ में क्रांति का ये ज्वार फूटा। जो मेरठ से शुरू होकर कानपुर, झांसी, दिल्ली और अवध तक पहुंचा। वैसे तो ये क्रांति एक सैन्य विद्रोह के रूप में हुई, पर समय के साथ इसका स्वरूप बदला और इसने जनव्यापी विद्रोह का रूप ले लिया। इस तरह से ये भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहलाया। आज आजादी के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की वर्षगांठ के मौके पर हम इससे जुड़ी खास बातें आपको बताने जा रहे हैं।
ऐसे हुई थी क्रांति की शुरूआत
असल में इस क्रांति की भूमिका काफी पहले से बन रही थी... दरअसल, ब्रिटिश सेना में 87 फीसदी से अधिक भारतीय जवान थे, जो कि ब्रिटिश सैनिकों की तुलना में भेदभाव का शिकार थे। ब्रिटिश सैनिकों की तुलना में इन्हें वेतन से लेकर इन्हे जरूर सहूलियतें काफी कम मिलती थी। बाकी रही सही कसर उन कारतूसों ने पूरी कर दी, जिनके बारे में कहा जा रहा था कि वो गाय और सूअर के मांस से बने थे। ऐसे में इसकी वजह से हिन्दू-मुस्लिम दोनो सैनिक गोरों से बेहद नाराज थे। उन्हें लगा कि ऐसा अंग्रेजी हुकूमत जानबूझकर उनके धर्म को भ्रष्ट करने के लिए कर रही है।
इसी के चलते, 29 मार्च (1857) को मंगल पांडे ने 'बैरकपुर छावनी' में अफसरों के विरुद्ध विद्रोह किया था, पर ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों ने इस विद्रोह को आसानी से नियंत्रित कर लिया और 8 अप्रैल को मंगल पांडे को फांसी दे दी गई। वहीं 24 अप्रैल को मेरठ में 85 सैनिकों ने नए कारतूस लेने से इंकार कर दिया। ऐसे में ब्रिटीश अफसरों ने इन 85 घुड़सवारों को कोर्ट मार्शल कर 5 वर्ष के कारावास की सजा दी।
इसके बाद 10 मई की शाम को भारतीय सिपाहियों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ खुली बगावत कर दी। उन्होने ब्रिटिश अफसरों की हत्या कर दी और जेल को तोड़ दिया। इसके बाद वो दिल्ली के लिए आगे बढ़े। अगले दिन 11 मई को उन्होने दिल्ली पहुंचकर वहां भी उन्होने अंग्रेजी अफसरों पर हमला बोला और 12 मई को दिल्ली पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होने मुगल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय को दिल्ली का सम्राट घोषित कर दिया।
अंग्रेजी हुकूमत इस बगावत को कुचलने में कामयाब रही।
धीर-धीरे ये विद्रोह कानपुर, बरेली, बनारस लखनऊ, इलाहाबाद और झांसी में भी फैल गया और इस तरह से 1857 का संग्राम एक साल से अधिक समय तक चला। पर आखिरकार अंग्रेजी हुकूमत इस बगावत को कुचलने में कामयाब रही। लगभग 14 महीने बाद 8 जुलाई, 1858 को लार्ड कैनिंग ने इस बात की औपचारिक घोषणा की, कि इस विद्रोह पर पूरी तरह काबू पा लिया गया है।
इस वजह से 1857 की क्रांति रह गई थी अफफल
दरअसल, इस क्रांति के सफल ना होने के पीछे कई सारे कारण थें, जैसे कि...
इस क्रांति के लिए ठीक से योजना नहीं बन सकी, क्योंकि ये क्रांति भारतीय सिपाहियों के गुस्से का परिणाम थी। ऐसे में इसकी रणनीति तैयार ना हो सकी।
भारतीय जनमानस भी इस तरह की क्रांति के लिए तैयार नहीं थी, वो इस तरह की विध्वसंक क्रांति देख डर गई और इसकी वजह से क्रांतिकारियों को जनता का सहयोगा नहीं मिल सका।
वहीं क्रांतिकारियों के पास जहां तीर-कमान, तलवार जैसे देसी हथियार थें, वहीं अंग्रेजी सेना के पास बंदूके गोला बारूद सब कुछ मौजूद था। ऐसे में ये अंग्रेजी सेना इस क्रांति की आग बुझाने में कामयाब हो गई।
हालांकि भले ही, 1857 की ये क्रान्ति सफल ना हो सकी, पर इसने भारतीय जन-मानस के दिलों में आजादी के लिए जो आग जगाई उसका परिणाम रहा कि उसके 100 वर्ष बाद देश स्वतंत्रता हासिल करने में कामयाब रहा।
Author: Yashodhara Virodai
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