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मुगल काल में भारत में कई सारी कलाओं का विकास हुआ और खासकर वास्तुकला इस समय में काफी समृद्ध हुई, जिसकी देन है देश में मौजूद बुलंद इमारतें और किलें। बात चाहें दिल्ली की शान लाल किले की कर लें या फिर आगरा के ताज की या फिर लखनऊ के भूलभूलैया की... भारत के तमाम किलें और इमारतें मुगल कालीन वास्तुकला की देन है। वैसे आज हम बात लाल किले की कर रहे हैं क्योंकि ये आज ही दिन बनकर तैयार हुआ था। जी हां, दिल्ली में मुगलिया सल्तनत की कहानी बयां करता लाला किला 1648 में 13 मई को साल ये बनकर तैयार हुआ था। तो चलिए आज आपको लाल किले के इतिहास और इसकी खूबियों के बारे में बताते हैं।
दरअसल, लाल किले का निर्माण पाँचवे मुगल बादशाह शाहजहाँ ने अपने महल के रूप में करवाया था। असल में, साल 1638 में जब शाहजहाँ ने अपनी राजधानी को आगरा से दिल्ली स्थानांतरित करने का निर्णय लिया तो इसके लिए उसने दिल्ली में एक आलीशान किले का निर्माण करने की सोची और इसकी जिम्मेदारी आर्किटेक्ट उस्ताद अहमद लाहौरी को दी, जिसने ताज महल का निर्माण किया था। चूंकि शाहजहां को सफ़ेद और लाल पसंद थें, ऐसे में उसने लाल किले का निर्माण लाल रंग के पत्थरों से करवाया और इस तरह से पड़ी लाल किले की नींव।इसके 10 साल बाद ये 13 मई 1648 में बनकर तैयार हुआ।
लाल किले का निर्माण पूरी तरह से मुगल कालीन परंपराओ और प्रतिमानों के अनुसार ही हुआ, जिसकी झलक आपको इसमें साफ साफ दिखाई देती है, वैसे लाल किले में काफी कुछ पर्शियन परंपराओ की छवि भी दिखाई पड़ती है। क्योंकि साल 1739 में पर्शियन शासक नादिर शाह ने दिल्ली पर आक्रमण कर इसे किले पर अपना आधिपत्य जमाया था, ऐसे में उसने अपने संस्कृति के अनुसार किले में कई बदलाव किए, जिसके कारण लाल किले में पर्शियन कला की झलक मिलती है।
लेकिन ब्रिटीश शाषन के दौरान इसका काफी हराश हुआ, खासकर जब 1857 का क्रांति के बाद जब मुगल शासक बहादुर शाह को परास्त अंग्रेजों ने इस पर कब्जा कर लिया। जिसके बाद ब्रिटिश अफसरो ने किलो के मार्बल के महलों को छोड़ बाकि हरम, क्वार्टर और गार्डन को भी काफी क्षति पहोचाई और फर्नीचर को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। वहीं किले में मौजूद कीमती चीजों को वो कर लंदन ले गए। इसमें शाहजांह के ताज में लगा कोहिनूर भी शामिल है।
इस तरह से देखा जाए तो लाल किलो के लभगग दो तिहाई हिस्से को तो ब्रिटिशों ने ध्वस्त ही कर दिया था और अब इस किले में केवल अब मनमोहक दीवारे ही बची हुई हैं।
हालांकि अब देश की विरासत के रूप में दुनियाभर में जाना जाता है। साल 2007 में यूनेस्को ने इसके महत्त्व को देखते हुए उसे वर्ल्ड हेरिटेज साईट घोषित किया है।
Author: Yashodhara Virodai
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