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बंदूक की बैरल के आगे तो अच्छे-अच्छे लोग अपना बयान बदल देते हैं। यदि बात अपने जान पर बन आये तो हर कोई लगभग यही करेगा। लेकिन ऐसा नहीं है कि दुनिया में हर कोई ऐसा ही है, जो महज अपने स्वार्थ के आगे कुछ और न सोचे और न ही किसी और की परवाह ही करे। ऐसे में अगर कोई बेजुबान हो तो फिर भला उसकी तो कोई सुध लेने वाली ही नहीं रह गया है आज के समाज में। यहाँ जो लोग ख़ुलकर याचना करते हैं उनके लिए तो कई कुछ करता नहीं है, ऐसे में भला इन बेजुबानों की सुध कौन ले। यद्यपि जो इन बेजुबानों की सुध आज ले रहा है, वो है ‘पीपल फॉर एनिमल्स’। आज हम आपको ऐसे ही एक ‘पीपल फॉर एनिमल्स’ विप्लव महापात्र से मिलवाने जा रहे हैं।
विप्लव महापात्र ओडिशा के अंगुल ज़िले के रहने वाले हैं। बचपन से ही विप्लव जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशील रहे हैं। ये अक्सर पहाड़ों और जंगलों में घूमने निकल जाते, जहाँ ऐसे लोगों के सम्पर्क में रहते जो जंगली जीवों को बचाने का काम करते। विप्लव महापात्र को बचपन से मिली इस संगत ने उन्हें बड़ा होकर एक गहरा प्रकृति प्रेमी बना दिया और उन्होंने जंगली जीवों को बचाने का बेड़ा उठाया और इस मुहिम में जुट गये। इस दिशा में काम करने के उद्देश्य से विप्लव ने साल 2012 में ‘पीपल फॉर एनिमल्स’ की यूनिट अपने ज़िले में ही शुरू की।
आज ‘पीपल फॉर एनिमल्स’ से 50 से ज़्यादा जुड़े हुए हैं, जो उड़ीसा के अलग-अलग हिस्सों में काम करते हैं। इस काम को करते हुए विप्लव महापात्र को कई तरह के जोखिम उठाने पड़े, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और बेजुबानों की बेहतरी और उनकी मदद के लिए हमेशा खड़े रहे। एक बार रेस्क्यू के दौरान विप्लव महापात्र को ज़हरीले साँप ने काट लिया, लेकिन वो इलाज के बाद बच गये। ऐसे ही जानवरों को बचाते हुए दो बार तस्करों ने विप्लव पर गोलियाँ भी चलाईं, पर वो बच गये। इसके बाद भी उन्होंने अपने मिशन का रास्त नहीं छोड़ा। इसीलिए जंगली जीवों का संरक्षण करने के लिए विप्लव का नाम लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में दर्ज़ किया गया है।
Author: Amit Rajpoot
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