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प्रवीण तुलपुले ने अपनी पढ़ाई ख़त्म करने के बाद नौसेना में अफ़सर कैडेट बनकर अपने परिवार का नाम रोशन किया। वो अपनी इस सफ़लता से काफी ख़ुश थे। लेकिन उससे भी अधिक वह ख़ुश रहा करते थे अपने दोस्तों और जानने वाले लोगों को जादू दिखाकर। जी हाँ, प्रवीण तुलपुले बचपन से ही बड़े हँसमुख स्वभाव के थे। इन्हें करामात दिखाने का शौक बी बचपन से था। इसलिए तक़रीबन 13-14 साल की उम्र से ही प्रवीण तुलपुले ने जादू दिखाना शुरू कर दिया था। ये काम इन्होंने नौसेना में नौकरी करते हुए भी जारी रखा था और इसी के चलते इन्हें साल 983 में राष्ट्रपति ने स्वर्ण पदक से सम्मानित भी किया था।
ग़ौरतलब है कि जादू के प्रति इतनी दीवानगी होने के बावजूद प्रवीण तुलपुले ने अब तक इसे सिर्फ़ शौकिया तौर पर ही आज़माया था। इन्होंने अपने इस हुनर को कभी पेशेवर तरीक़े से नहीं आयोजित किया। अब तक प्रवीण तुलपुले नौसेना के कार्यक्रमों में, सहकर्मियों की पार्टियों में और विबिन्न मौक़ों पर दोस्तों के घर आदि में बस दिखाया करते थे। लेकिन इन्हें क्या पता था कि ये एक दिन ‘हैप्पीः द क्लाउन’ बन जाएंगे।
हुआ यूँ कि अपनी मुम्बई पोस्टिंग के दौरान प्रवीण तुलपुले के एक दोस्त ने उनसे कहा कि बच्चों की एक पार्टी है, वहाँ जोकर बनकर आ जाता। प्रवीण ने इसे स्वाकार लिया और जोकर बनकर बच्चों की पार्टी में जा पहुँचे। प्रवीण तुलपुले ने देखा कि वे सारे तो कैंसर पीड़ित बच्चे हैं। किसी के चेहरे पर मास्क लगा था, ज़्यादातर के सिर पर बाल ही ग़ायब थे, तो कोई ह्वील चेयर पर था। उनमें से एक बच्चा प्रवीण तुलपुले के पास घूमता रहा और अंत में फोटो खिंचवाकर चला गया। ये फोटो अगले दिन अख़बार में भी छपी, क्योंकि वह बच्चा जोकर से मिलना चाहता था। कुछ दिन बाद प्रवीण को पता चला कि वो लड़का इस दुनिया में अब नहीं रहा।
इस घटना ने प्रवीण तुलपुले को भीतर तक हिला दिया। उन्होंने तय किया कि अब वह कैंसर पीड़ित बच्चों के चेहरों में ख़ुशियाँ लाने के लिए सिर्फ़ जोकर का ही काम करेंगे और उन्होंने अपने इस जोकर का नाम रखा- ‘हैप्पीः द क्लाउन’। इस जुनून में प्रवीण ने अपनी नौसेना की नौकरी भी छोड़ दी। हैरानी है कि नौसेना में जितने साल पेंशन के लिए चाहिए होते हैं, प्रवीण ने उन्हें पूरा होने की भी परवाह नहीं की। आज वह सिर्फ़ कैंसर पीड़ित बच्चों को हँसाने का ही काम करते हैं।
Author: Amit Rajpoot
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