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भगवान बुद्ध कहते हैं कि मनुष्य को हमेशा होश पूर्वक जीना चाहिए। उसे अपने होश का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। लेकिन व्यक्ति केवल कभी-कभी ही होश में आता है, बाक़ी का पूरा जीवन वह बेहोशी में रहकर निकाल देता है। एक व्यक्ति बुद्ध के पास आकर बोला हे बुद्ध! कल जब आप सभा कर रहे थे तो कहा था कि सभी मनुष्य सो रहे हैं, इन्हें जागृत होना होगा। सभी बेहोश हैं, उन्हें होश में आना है। व्यक्ति बोला- हे बुद्ध! हम सभी रात को सोते हैं और सुबह जाग जाते हैं। दिनभर होश में रहकर ही तो हम सभी अपना-अपना काम करते हैं और रात को फिर से सो जाते हैं और सुबह फिर जागते हैं, फिर आप ऐसा क्यों कहते हैं।
बुद्ध मुस्कुराये और बोले- तुम तनिक जागृत हो इसीलिए यहाँ आये हो, ये बात मैंने गाँव वालों से कही भी हैं, लेकिन बाकी के सभी तो सोये हुये ही हैं न। इसलिए उनमें से कोई भी व्यक्ति इस शंका को लेकर मेरे पास नहीं आया। तुम जाग रहे हो, इसलिए संदेह कर रहे हो और सवाल कर रहे हो। वह व्यक्ति बोला- हे बुद्ध! मैं आपकी बात पूरी तरह से अभी भी नहीं समज सका।
बुद्ध ने अब उस व्यक्ति से पूछा कि जब तुम पहली बार पिता बने तो तुमने कैसा अनुभव किया था? व्यक्ति ने कहा कि मैंने जब अपने पुत्र को अपने हाथ से छुआ तो मुजे ऐसा महसूस हुआ कि मानों दुनिया की सारी ख़ुशियाँ मेरे हाथों में आ भरी हैं। बुद्धि ने पूछा- क्या तुम अभी भी अपने पुत्र को छूकर या देखकर वैसा ही अनुभव करते हो, जैसा कि तुमने पहली बार अनुभव किया था। व्यक्ति का जवाब न में था।
बुद्ध ने उस व्यक्ति को समझाया कि देखो वह एक मौक़ा था जब तुम्हें पुत्र प्राप्त हुआ तो तुम जागे थे, लेकिन धीरे-धीरे तुम्हारी वो जागृति समाप्त हो गया और तुम प्रतीक में जी रहे हो। ऐसे ही पूर्ण प्राकृतिक होकर सदैव होश पूर्वक हर चीज़ को उसकी महत्ता के अनुकूल महसूस करते रहना ही जागृति अवस्था होती है, जो भी मनुष्य ऐसा नहीं महसूस कर पाता, वह सो रहा है।
Author: Amit Rajpoot
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