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सियासत के गलियारों में इन दिनों एक महापुरुष का नाम देशभर में ख़ूब सुनाई दे रहा है और वह नाम है हमारे देश के प्रखर चिन्तक, सुधारक और महान विचारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर का। दरअसल देश में चल रहे आम चुनावों के दौरान हाल ही में पश्चिम बंगाल में एक पार्टी ने कोलकाता विश्वविद्यालय के ईश्वरचंद्र विद्यासागर कॉलेज में प्रदर्शन किया, जहाँ हिंसा भड़की थी। इसी हिंसा के दौरान इस कॉलेज में लगी ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ती भी तोड़ दी गयी। इससे बाद तो बंगाली अस्मिता को लेकर देशभर में सवाल उठने लगे और इन्हीं सवालों में ईश्वरचंद्र विद्यासागर को एक बार फिर से चर्चा का विषय बना दिया। लेकिन ये चर्चाएँ सियासी अखाड़े में उपजी ज़रूर हैं, लेकिन हम आपको इस बहाने ईश्वरचंद्र विद्यासागर के कुछ दिलचस्प किस्से बताएँगे।
आपको बता दें कि एक प्रखर चिन्तक, सुधारक और महान विचारक से लेकर एक लेखक तक ईश्वरचंद्र विद्यासागर एक ऐसी हस्ती रहे, जिनको न सिर्फ़ बंगाल बल्कि पूरा देश ही अपना आदर्स समझता है और नमन करता है। दिलचस्प है कि इन्हीं ईश्वरचंद्र विद्यासागर के दम पर और इनके मौजू प्रयासों और कोशिशों के चलते ही ब्रिटिश सरकार को 26 जुलाई, 1856 को हिन्दू विधवा पुनर्विवाह एक्टः 1856 पारित करना पड़ा था। यही कारण है कि ईश्वरचंद्र विद्यासागर को इस देश में विधवाओं के पुनरोद्धार का मसीहा माना जाता है। उनके इस प्रयास के कारण ही यहाँ विधवाओं को सिर उठाकर जीने का सम्मान प्राप्त हुआ।
इतना ही नहीं, ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अपने इकलौते बेटे नारायण चन्द्र बंद्योपाध्याय का विवाह भी एक विधवा से ही करवाया। सुधारक के रूप में ईश्वरचंद्र विद्यासागर को राजा राम मोहन राय का उत्तराधिकारी माना जाता है। आपको बता दें कि लड़कियों की शिक्षा के लिए भी ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने जमकर प्रयास किये। इसके लिए वो हर घर के दरवाज़े पर जाकर लड़कियों की शिक्षा के लिए न सिर्फ़ लोगों को जागरुक बनाया, बल्कि इन्होंने 35 स्कूल भी खोलवाए थे।
Author: Amit Rajpoot
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