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Parle G के बारे में भारत का बच्चा-बच्चा, बूढ़ा-बूढ़ा जानता है। यही वह बिस्किट है, जो आज़ादी के पहले से लोगों की चाय का साथी बना हुआ है। दिलचस्प है कि आज भी Parle G बच्चो से लेकर बड़े और बूढ़ों तक के लिए बेहद ख़ास है। वास्तव में Parle G कई लोगों के संघर्षों का साथी भी रहा है, क्योंकि पैसों के अभाव में Parle G को खाकर न जाने कितने लोगों ने अपनी भूख तक मिटाते हैं, वह भी दो-एक दिन नहीं, बल्कि महीनों-महीनों। आइए आज हम आपको Parle G के बारे में कुछ दिलचस्प बातते हैं, जिन्हें सुनकर आपको Parle G पर गर्व महसूस होगा।
आपको बता दें कि Parle G वह पहला बिस्किट था जो भारत में बना और आम भारतीयों के लिए बना। जी हाँ, Parle G आज या कल का बिस्किट नही है, बल्कि कई सालों पुराना बिस्किट है। भारत की आज़ादी से पहले ही इसकी नींव रखी गयी थी। मालूम हो कि Parle G बिस्किट के निर्माण से पहले देश में अंग़्रेज़ों का हर ओर दबदबा था। विदेशी चीज़ें ही भारतीय बाज़ारों में पटी पड़ी थीं, जो काफी महँगी होती थीं। ऐसे में आम भारतीय कुछ भी अच्छा खाने से महरूम रह जाते थे। बिस्किट और कैण्डी जैसी चीज़ें केवल अमीरों तक ही सीमित रहती थीं। केवल उन्हीं के बच्चे इनका मड़ा ले पाते थे।
ये बात उस दौर में स्वदेशी आंदोलन से प्रभावित मोहनलाल दयाल को पसन्द नहीं आयी। ऐसे में उन्होंने तय किया कि वे भारत के लोगों के लिए भारत में बनी कैण्डी और बिस्किट लायेंगे। इसके लिए वो जर्मनी निकल गये और वहाँ कैण्डी और बिस्किट बनाना सीखा और साल 1929 में 60,000 रुपये की मशीन भारत ले आये और यहाँ मुम्बई के पास बिड़ला-पार्ला में एक पुरानी फैक्ट्री ख़रीदा और अपने परिवार के ही 12 लोगों से साथ मिलकर कंपनी का नवीनीकरण किया। इस नयी कंपनी का नाम रखा गया Parle.
Parle कंपनी में ही साल 1939 में Parle Gluco नाम का बिस्किट बनना शुरु हुआ। ये बिस्किट गेहूँ के आटे से बनाया गया, जिसका स्वाद को लाजवाब था ही ये काफी पौष्टिक भी था। देखते-ही देखते आम लोगों के बीच ये काफी प्रसिद्ध होने लगा। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद तक Parle Gluco ने पूरे बाज़ार में अपनी पैट बना ली और हर घर तक Parle Gluco पहुँच गया। साल 1982 में Parle Gluco का नाम बदलकर ‘Parle G’ रख दिया गया, जो आम भारतीय का बिस्किट आज बी बना हुआ है।
Author: Amit Rajpoot
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