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दौड़भाग भरी जिंदगी में हम वो सब भूल गए है जो हमारे इमोशन से जुड़ा है, एक समय था जब बच्चे के पीछे उसकी मां सारी दिन लगा देती थी। भूख लेगे तो उसे खाना खिलाना, नींद आए तो लोरी सुनाना। अब लगता है की बचपन जैसे खो सा चुका है।
आपको भी जरूर याद आता होगा, वो नटखट शरारते, लड़ना झगड़ना पूरा दिन तफरी रहती थी और जब रात आती थी, तो सबसे हसीन पल आता था, जब माँ हमें लोरियां सुनाया करती थी। लेकिन आज की पीढ़ी को कहाँ मिलता है लोरियों वाला प्यार? आज का बचपन तो गुज़रता है, वीडियो गेम्स में, टेलीविज़न पर, मोबाइल्स में। तो चलिए आज हम आपको इन सबसे दूर वही पूराने वाले दिन याद दिलाते है आपको बचपन की ‘लोरियों’ की दुनिया में लेकर जाते है।
चंदा मामा की लोरी तो आपने ज़रूर सुनी होगी। जब बचपन में हम लोग खाना नहीं खाते थे तो मां तरह-तरह की लोरियां गाकर खानी खिलाती थी। खासतौर पर जब बच्चों को दूध पिलाने की बात आती थी। कभी अपने बच्चों को सुलाने के लिए मां लोरियों का सहारा लेती थी। कितना सुकुन था उस वक्त लोरी सुनते सुनते ही हम गहरी नींद में सो जाया करते थे।
आज बचपन कहीं खो सा गया है और हम लोग ज़िदंगी की रेस में आगे बढ़ने में लगे हैं लेकिन सच तो ये है कि हमारा खोया बचपन सिर्फ हमारी मां है। आजकल वो लोरियां तो नहीं रही लेकिन हम ये कोशिश कर सकते हैं कि लोरियाँ जिंदा रहें और कहीं ये गुमनामी में दम ना तोड़ दें.
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