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आज हमारे समाज में प्रेम विवाह की प्रवृत्ति बढ़ती देखी जा रही है और लोग इस बारे में अपनी ख़ुलकर राय ज़ाहिर कर रहे हैं, लेकिन समाज में बैठे कुछ दृढ़ी लोग प्यार पर पहरे लगाकर बैठे होते हैं। ऐसे में उनका सबसे बड़ा मुद्दा जाति और गोत्र का होता है। लेकिन वास्तव में अपने गोत्र और जाति से बाहर विवाह करना बहुत ही अच्छा होता है। जी हाँ, जैसा कि हम सब जानते ही हैं कि हमारी वैदिक गोत्र प्रणाली पूरी तरह से वैज्ञानिक है, जो कि हमारे गुणसूत्रों पर आधारित होती है। गोत्र वास्तव में हमारे भीतर y गुणसूत्र को ट्रेस करने का एक माध्यम होता है।
उदाहारण के लिए यदि किसी व्यक्ति का गोत्र कश्यप है, तो उस व्यक्ति में विद्यमान y गुणसूत्र कश्यप ऋषि से आया है या कश्यप ऋषि उस y गुणसूत्र के मूल हैं। चूँकि y गुणसूत्र स्त्रियों में नहीं होता है, यही कारण है कि विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र के साथ जोड़ दिया जाता है। ऐसे में वैदिक संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारण यह है कि एक ही गोत्र से होने के कारण वह पुरुष व स्त्री भाई-बहन कहलायेंगे, क्योंकि उनका पूर्वज एक ही है।
आज की आनुवंशिकी विज्ञान के अनुसार यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह होता है, तो उनकी सन्तति आनुवंशिक विकारों के साथ उत्पन्न होगी। ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता।
ऐसे बच्चों में सदैव रचनात्मकता का अभाव होता है। विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है, कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात् मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से संगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था।
Author: Amit Rajpoot
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