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हिन्दू धर्म में गुरु पूर्णिमा को बहुत महत्व दिया गया है। इस दिन अपने गुरु की पूजा की जाती है। इस साल यह 16 जुलाई के दिन मनाई जा रही है। ऐसी मान्यताएं हैं कि आज ही के दिन आदिगुरु, महाभारत के रचयिता और चारों वेदों के व्याख्याता महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था। बता दें कि, 16 जुलाई को ही चंद्र ग्रहण भी लग रहा है ऐसे में सूतक लगने से पहले ही अपने गुरु की पूजा कर लेना ही उचित है। गुरु को इस दुनिया में सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है।
वह गुरु ही होते हैं जो मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में हमें आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करते हैं और हमेशा सही रास्ता दिखाते हैं। गुरु की हमारी जिंदगी में बहुत अहमियत हैं। आज बेशक हमें किसी भी चीज की शिक्षा हासिल करने के लिए अपने गुरु को इसका शुल्क देना पड़ता है, लेकिन पहले ऐसा नहीं था। दरअसल, प्राचीन काल में जब शिक्षा के बदले में विद्यार्थियों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता था बल्कि वह साल में एक दिन अपने गुरु की पूजा-अर्चना कर उन्हें दक्षिणा देते थे।
माता-पिता और देवता के समान गुरु:-
भारतीय संस्कृति में गुरु को माता-पिता के समान स्थान दिया गया है। वह गुरु ही हैं जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसा ही सम्मान देने कि पद्धति पुरातन है। प्राचीन काल में केवल गुरु ही अपने विद्यार्थियों को सांसारिक और आध्यात्मिक ज्ञान दिया करते थे। लेकिन वक्त के साथ बहुत सारी चीजों में बदलाव आए हैं आज बेशक हमें कई लोगों से शिक्षा हासिल हो सकती है, हालांकि वे शिक्षक कहलाएंगे गुरु नहीं।
धर्मग्रंथों में गुरु की गुरु शब्द की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि, जो अपने विद्यार्थी के कानों में ज्ञान के अमृत को सींच कर और धर्म का रहस्योद्घाटन करता है वही गुरु कहलाता है। कहा जाता है कि माता-पिता ने तो केवल हमारे शरीर की उत्पति की है, लेकिन गुरु ही जिन्होंने अपने जीवन को सुसंस्कृत बनाने का कार्य किया है।
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