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आपने बड़े-बुज़ुर्गों को ये कहते सुना होगा कि लड़कियों का कोई गोत्र नहीं होता। जी हाँ, ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उनमें y गुणसूत्र होता ही नहीं है, जो कि गोत्र का मुख्य आधार होता है। ऐसे में यदि पुत्र है, तोउसमें 95% पिता और 5% माता का सम्मिलन होता है और यदि पुत्री है तो 50% पिता और 50% माता का सम्मिलन है होता। इसके बाद यदि पुत्री की पुत्री हुई तो वह डीएनए 50% का 50% रह जायेगा, फिर यदि उसके भी पुत्री हुई तो उस 25% का 50% डीएनए रह जायेगा। इस तरह से सातवीं पीढ़ी में पुत्री जन्म में यह प्रतिशत घटकर 1% रह जायेगा। अर्थात, एक पति-पत्नी का ही डीएनए सातवीं पीढ़ी तक पुनः पुनः जन्म लेता रहता है और यही है सात जन्मों का साथ।
लेकिन,अब समझने वाली बात है कि जब पुत्र होता है तो उसका गुणसूत्र पिता के गुणसूत्रों का 95% गुणों को अनुवांशिकी में ग्रहण करता है और माता का 5% (जो कि किन्हीं परिस्थितियों में एक प्रतिशत से कम भी हो सकता है) डीएनए ग्रहण करता है और यही क्रम अनवरत चलता रहता है, जिस कारण पति और पत्नी के गुणयुक्त डीएनए बारम्बार जन्म लेते रहते हैं। अर्थात यह जन्म-जन्मांतर का साथ हो जाता है।
इसीलिए अपने ही अंश को पितृ जन्मों-जन्म तक आशीर्वाद देते रहते हैं और हम भी अमूर्त रूप से उनके प्रति श्रृद्धेय भाव रखते हुए आशीर्वाद ग्रहण करते रहते हैं। अतः माता पिता यदि अपनी बेटी का कन्यादान करते हैं, तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं है, कि वे कन्या को कोई वस्तु समझकर उसे दान करते हैं, बल्कि इस दान का विधान इस निमित्त किया गया है, कि दूसरे कुल की कुलवधू बनने के लिये और उस कुल की कुलधात्री बनने के लिये कन्या को गोत्र मुक्त होना चाहिये।
ऐसा करने से अपने पिता के गोत्र का संवहन यानी उत्तराधिकार पुत्री को एक पिता प्रेषित न कर सके, इसलिये विवाह से पहले कन्यादान कराया जाना बहुत ज़रूरी होता है और गोत्र मुक्त कन्या का पाणिग्रहण कर भावी वर अपने कुल गोत्र में उस कन्या को स्थान देता है, यही कारण था कि हमारे यहाँ विधवा विवाह भी स्वीकार्य नहीं किया जाता था, क्योंकि कुल गोत्र प्रदान करने वाला उसका पति तो मृत्यु को प्राप्त कर चुका है।
Author: Amit Rajpoot
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