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दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जहाँ की शिशु मृत्युदर काफी अदिक है। दुर्भाग्य से भारत बी उन देशों में शामिल है। जी हाँ, आपको बता दें कि नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे देशों में शिशु मृत्युदर भारत के कम है। ग़ौरतलब है कि ग़रीबी व कुपोषण के चलते दुनिया के कई देशों के बच्चे अपनी उम्र का पाँचवा वर्ष भी नहीं लांघ पाते हैं। साल 20017 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की आयी एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रति हज़ार बच्चों पर सबसे ज़्यादा मृत्युदर पाकिस्तान के बाद भारत की ही है। ऐसे में जहाँ सरकार बाल मृत्यु दर को रोकने के ले अपने प्रयास कर रही है, उससे इतर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो एक-एक बच्चे की ज़िन्दगी बचाने की ख़ातिर संघर्षों का पहाड़ पार कर रहे हैं, ऐसे ही बेहद चंद लोगों में शामिल है अरुणांचल प्रदेश के श्री फुरपा।
श्री फुरपा अरुणांचल प्रदेश के तवांग ज़िले के रहने वाले हैं और इस ज़िले में दुर्गम रास्तों व बर्फ़ीले पहाड़ों के पार एक मागो गाँव हैं, जहाँ 70 परिवार रहते हैं। इस गाँव में मीज़ल्स और रुबेला के संक्रमण के चलते बच्चों के जीवन का ख़तरा है और इससे उन्हें सुरक्षित करने के लिए श्री फुरपा चुनौतियों का सामना करते हुए एक अभियान में हैं। आपको बता दें कि इन परिवारों में कुल 35 बच्चों का टीकाकरण करने के लिए श्री फुरपा दुर्गम रास्तों व बर्फ़ीले पहाड़ों वाले 36 किमी का रास्ता पार चढ़ते हैं।
क्या है रुबेलाः
मीज़ल्स और रुबेला, पूरे विश्व में फैली हुई जानलेवा बीमारियाँ हैं। अगर रिपोर्ट्स की मानें तो साल 2000 से, लगभग साढ़े पाँच लाख बच्चे हर साल मीज़ल्स के चलते अपनी जान गँवा देते हैं। तो वहीं, रुबैला से होने वाली मौतों की संख्या भी एक लाख से ज़्यादा है। रुबैला का सबसे ज़्यादा खतरा गर्भवती महिलाओं को होता है। यदि सही समय पर इसका टीकाकरण न किया जाये तो अक्सर नवजात बच्चे दिल की बीमारी के साथ या फिर बहरे या नेत्रहीन पैदा होते हैं।
भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने ‘मीज़ल्स-रुबैला वैक्सीनेशन अभियान’ शुरू किया है, जिसके तहत 9 महीने से लेकर 15 साल तक के बच्चों का समय-समय पर टीकाकरण किया जा रहा है। वैसे तो विश्व स्वास्थ्य संगठन की मदद से इस बीमारी से साल 2020 तक निजात पाने की योजना है, और उम्मीद है कि फुरपा जैसे निःस्वार्थ लोगों के प्रयासों के चलते हम यकीनन इसमें सफल होंगें।
Author: Amit Rajpoot
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