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भारत में एक किलो कॉटन तैयार करने में 22,500 लीटर पानी खर्च होता है। हम जो खाते हैं, ख़रीदते हैं और पहनते हैं, हर उस सामान को तैयार होने में जो पानी खर्च होता है उसे वर्चुअल वॉटर कहते हैं। यानी कि वो पानी जो हमें दिखी नहीं देता, लेकिन उसके पैरों के निशान अर्थात् वॉटर फुटप्रिंट हर उस सामान में मौजूद होते हैं, जिन्हें हम अपने इस्तेमाल में लाते हैं। आपको बता दे कि कोई भी देश, राज्य, संस्थान, कम्पनी या हम ख़ुद पानी को लेकर कितने सीरियस हैं इस बात को समझने से पहले हमें वॉटर फुट प्रिंट को समझना होगा।
क्या है वॉटर फुट प्रिंट?
फर्ज कीजिए कि आप एक कप कॉफी की डिमांड करते हैं, तो अब आपकी समझ में उसे बनाने में अधिक से अधिक एक कप से थोड़ा कम ही पानी लगेगा या आधे कप से भी कम। लेकिन सच तो ये हैं कि एक कप कॉफी को बागान से लेकर आपकी टेबल तक पहुँचाने में 140 लीटर पानी खर्च होता है। इस कुल खर्च हुए पानी को ही कहते हैं वॉटर फुट प्रिंट। ऐसे में 1 कप कॉफी का वॉटर फुट प्रिंट 140 लीटर पानी है। यानी की आपको एक कप कॉफी का स्वाद दिलाने के लिए 140 लीटर पानी खर्च करना पड़ा होगा।
ऐसे ही डेनिम जींस हम सभी को बहुत ही कंफर्ट लगती है और लड़का हो या लड़की हम में से ज़्यादातर लोगों की पसन्द का पहनावा भी यही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक जीन्स को तैयार होने में 11,000-15,000 लीटर पानी खर्च होता है और एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में हर साल 70-80 करोड़ जीन्स बिकती हैं। यानी कि अगर आप सालभर में सिर्फ़ दो जीन्स भी ख़रीद रहे हैं, तो उसे अपकी अलमारी में पहुँचने से पहले ही उस पर 30,000 लीटर पानी खर्च किया जा चुका है।
ऐसे में हमें किसी भी चीज़ के इस्तेमाल से पहले उसके वॉटर फुट प्रिंट को समझने की ज़रूरत है और इसके बाद हमें कम से कम वॉटर फुट प्रिंट वाली चीज़ों का इस्तेमाल करना होगा। हालाँकि ये जानना आसान नहीं है, क्योंकि अभी तक तो ये सामान बनाने वाली कंपनियों ने ही इसका हिसाब लगाना शुरू नहीं किया है कि वह कितना पानी खर्च कर रहे हैं।
फिर भी हम कम पानी की लागत वाले अनाज अपना सकते हैं, खाने को बर्बाद होने से बचा सकते हैं और कपड़ों की बहुत ज़रूरत न हो ख़रीदारी भी कम से कम करें। यानी कि अगर आपके पास पहले से ही दो-तीन जीन्स या कॉटन की शर्ट्स हैं तो फिर चौथी ख़रीदते वक़्त सौ बार सोचिए, क्योंकि आप जो खाते, पीते और पहनते हैं इसका सीधा असर दुनियाभर के उन करोड़ों लोगों पर सीधे तौर पर पड़ता है, जो पानी की समस्या से जूझ रहे हैं।
Author: Amit Rajpoot
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