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रामसेतु के निर्माण में हम सभी ने गिलहरी वाली कथा ज़रूर सुनी होगी। लेकिन क्या हमें ये पता है कि रामसेतु निर्माण में गिलहरी के श्रमदान की कथा के क्या मायने हैं? शायद नहीं, तो आज हम आपको इसके मायने बताने जा रहे हैं। इससे पहेल आपको बताते चलें कि भगवान राम के रावण से युद्ध से पहले रामेश्वरम् में सेतु के निर्माण के समय एक गिलहरी अपने बालों में रेत भरकर लाने और उसे समुद्र में फेंकने के का काम कर रही थी। उसके इस कर्म को महान सहयोगों के समकक्ष दर्ज़ा देने के कृत्य को एक पवित्र आध्यात्म के रूप में देखा गया है।
जी हाँ, आपको बता दें कि ऐसा निरूपित किया गया है कि सेवा सहायता के कर्म को आध्यात्मिक रूप देने के लिए कुछ उचार भी किये जाते हैं। जैसे कि दान करने से पहले उसका संकल्प करना, पूजा-पाठ, याचक या दान ले वाले का आदर और सत्कार आदि का एक विधिविधान है। उस विधान का उद्देश्य मन को उस ऊँचाई तक ले जाना है, जहाँ से पवित्रतता और उत्साह की लहरें उठें। इस पूरे मर्म को वह गिलहरी जी रही थी।
ऐसे में आपको बता दें कि दान का सीधा सा अर्थ है देना, लेकिन इसका ज़िक्र जब भी किसी सराहनीय और अवश्य किये जाने लायक काम के तौर पर किया जाता है तो उसका अर्थ किसी की सेवा और सहायता के लिए कुछ देना ही नहीं है, बल्कि उसके साथ जुड़ी भावना भी काफ़ी महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए रामसेतु निर्माण में गिलहरी के श्रमदान से बले ही पुल के निर्माण में कोई प्रभावी परिवर्तन न हुआ हो, लेकिन गिलहरी का भाव पूज्यनीय है।
Author: Amit Rajpoot
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