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पश्चिमी घाट पर्वत यानी कि सहयाद्री पठारों का एक दुर्गम क्षेत्र है। यहाँ के गाँवों में रहने वाले निवासियों को अपने जीवन यापन के लिए बेहद संकुचित होकर रहना पड़ता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ये अपने इलाक़ों से निकलकर बाहर के दूसरे शहरों में सम्पर्क में नहीं आ पाते। यदि यह ऐसा करना भी चाहते हैं तो इसके लिए इन्हें ख़ासा ख़तरा मोल लेना पड़ जाता है। ऐसे में इनके लिए मुख्य धारा में आना मुमकिन नहीं हो पाता है। आपको बता दें कि अब तक ऐसा ही होते आया है, क्योंकि यहाँ पुल बनाना भी कठिन है। लेकिन इस कठिन काम को कर्नाटक के दक्षिण कर्नाटक ज़िले के सुल्लिया के रहने वाले गिरीश भारद्वाज ने कर दिखाया है।
जी हाँ, आपको बता दें कि गिरीश भारद्वाज ने पश्चिमी घाट के दुर्गम इलाक़ों में पुल बनाकर लोगों का जीवन आसान बना दिया है। जबकि इससे पहले जैसा कि बताया जा चुका है कि पुल न होने की वजह से पहले गाँव के लोग मुख्यधारा से कटा महसूस करते थे, पर अब वह धीरे-धीरे वहां से बाहर निकलने लगे। इस काम में गिरीश भारद्वाज को कई सारी दिक्कतों का भी सामना करना पड़ा जैसे कि उन्हें नक्सलियों ने जान से मारने की धमकी दी और डराया। लेकिन गिरीश भारद्वाज ने बिना डरे नक्सलियों के वर्चस्व वाले इलाक़ों में भी पुल बनाकर सबको हैरान हैरान कर दिया है।
दिलचस्प है कि गिरीश भारद्वाज जो भी पुल बनाते हैं उसे अपनी निर्माण तकनीकी से पारंपरिक पुलों की तुलना में सिर्फ 10 फीसदी की लागत में और औसतन कम समय में ही निर्मित कर देते हैं। यह उनकी सबसे ख़ास और महत्वपूर्ण बात है। ये बात भी ग़ौर करने लायक है कि गिरीश भारद्वाज ने न सिर्फ़ पश्चिमी घाट पर्वत बल्कि पूर्वी घाट के पर्वतों पर बसे गाँवों में भी पुल बनाये हैं। इसके लिए इनकी टीम में क़रीब 30 इंजीनियर शामिल हैं, जो पुल निर्माण के विशेषज्ञ हैं। इस प्रकार गिरीश भारद्वाज और इनकी टीम ने अब तक तक़रीबन 127 पर्यावरण-अनुकूल पुलों का निर्माण कर दिखाया है, जिसके लिए इन्हें भारत सरकार ने साल 2017 में पद्मश्री के सम्मान से सम्मानित भी किया है।
Author: Amit Rajpoot
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