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कुछ बड़ा करने के लिए एकदम शान्ति और शालीनता के साथ सबसे निचले पायदान पर चीज़ों की शुरुआत करने वाले हमेशा अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। इस मामले में सबसे खास बात यह होती ह कि लोगों के असफ़ल होने की गुंजाइश लगभग पूरी तरह से समाप्त ही हो जाती है। कुछ ऐसी ही कहानी है जसवंती बेन की, जो कि मुम्बई के गिरगाँव की रहने वाली हैं। हालाँकि जसवंती बेन का बचपन बेहद ग़रीबी में बीता था बावजूद इसके वह आज अपने एंटरप्रेन्योरशिप की बदौलत करोड़ों की मालकिन हैं। ये जसवंती बेन कोई और नहीं, बल्कि लिज्जत पापड़ वाली जसवंती बेन ही हैं।
आपको बता दें कि जसवंती बेन अपने परिवार को ध्यान में रखकर कुछ ऐसा काम करना चाहती थीं, जिसके लिए घर से बाहर भी न जाना पड़े और कुछ पैसे भी आ जायें। इसी विचार की परिणाम था कि जसवंती बेन को एक ख़ास क़िस्म का पापड़ बनाने का विचार आया, जिसे बनाने के लिए उन्होंने 100 रुपये उधार लेकर दालें और मसाले ख़रीदे और गुंते हुए आटे में मिलाकर तक़रीबन 80 पापड़ बनाएँ। लेकिन जसवंती बेन को क्या पता था कि उनके ये 80 पापड़ एक दिन देश और दुनिया में मिसाल बनने वाले हैं।
दिलचस्प है कि जब जसवंती बेन ने अपने इन पापड़ों को दुकान में बेचा तो इसके पैकेट का नाम दिया लिज्जत पापड़। यहीं से लिज्जत पापड़ के उद्योग की शुरुआत हो गयी थी, क्योंकि दुकानदार को वो पापड़ काफ़ी पंद आये थे और उसने जसवंती बेन को और पापड़ बनाने के लिए कहा। इसके बाद जसवंती बेन ने कुछ अन्य महिलाओं को प्रोत्साहित करते इससे जोड़ा और बन गयी लिज्जत पापड़ की कंपनी।
जसवंती बेन के इस संस्थान के सफर में पहला महत्वपूर्ण पड़ाव 1966 में तब आया, जब संस्था को बांबे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट 1950 के तहत और सोसायटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत पंजीकरण प्राप्त हुआ और खादी एवं ग्राम उद्योग आयोग ने कुटीर उद्योग के तौर पर संस्थान को मान्यता दी।
मालूम हो कि आज 301 करोड़ रुपये तक के सालाना कारोबार की एक बेमिसाल कहानी कहती है। इस व्यवसाय के माध्यम से आज 40000 से ज्यादा महिलाओं को अपनी पहचान प्राप्त हुई है। इन महिलाओं का आभा भारतभर में 81 शाखाओं और 27 डिविजनों से छनकर दूर विदेश तक नारी सशक्तिकरण को रोशनी प्रदान कर रही है। जसवंती बेन की उपलब्धि इसलिए भी ख़ास और प्रेरणादायक है, क्योंकि वो न केवल ग़रीब परिवार से ताल्लुकात रखती हैं, बल्कि उनकी शिक्षा भी कुछ खास नहीं थी।
Author: Amit Rajpoot
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