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इस साल बकरीद 12 अगस्त को देशभर में मनाई जाएगी। इसे ईद-उल-अजहा भी कहते है, ये एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘ईद-ए-कुर्बानी’ यानी बलिदान की भावना वाली ईद। ईद-उल-फितर जहां हर तरफ प्रेम और मिठास घोलती है, वहीं ‘ईद-उल-अजहा’ अपने फर्ज यानि की कर्तव्यों के लिए कुर्बानी की भावना सिखाती है। इस दिन मान्यता है कि अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी दी जाती है। आमतौर पर लोग इस दिन बकरे की कुर्बानी देते हैं। लेकिन सवाल ये उठाता है कि क्यों ईद-उल-अजहा के मौके पर कुर्बानी की ईद मनाई जाती है? इसके पीछे क्या कहानी है?
इस्लाम में हजरत इब्राहिम को अल्लाह का पैगंबर कहा जाता है। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी समाजसेवा और जनसेवा में लगा दी थी। 90 की उम्र तक उनकी कोई संतान नहीं हुई, लेकिन अल्लाह की इबादत के बाद सालों बाद उनके घर एक चांद-सा बेटा इस्माइल हुआ। लेकिन कुछ समय बाद ही हजरत इब्राहिम की अजमाइश यानि कि परीक्षा के लिए अल्लाह ने उन्हें अपनी किसी भी प्यारी चीज़ की कुर्बानी देने को कहा। उन्होंने सबसे पहले ऊंच की कुर्बानी दी, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें दोबारा ये सपना आया। इस बार उन्होंने दूसरे जानवर की कुर्बानी दी... लेकिन वो सपना उन्हें बार-बार आता रहा। उन्होंने ऐसा करते-करते सभी जानवरों की कुर्बान कर दिया, लेकिन उनका सपना नहीं थमा। अब उनके पास एक ही सबसे प्यारी चीज बची थी, वो था उनका इकलौता बेटा इस्माइल। अल्लाह पर भरोसा रखते हुए उन्होंने इस्माइल को कुर्बान करने का निर्णय लिया। अपने बेटे को कुर्बान होते हुए न देख पाने की वजह से उन्होंने अपनी आंख पर पट्टी बांध ली और उसकी कुर्बानी दे दी। लेकिन जैसे ही उन्होंने अपनी आंखों की पट्टी हटाई, सामने का मंजर बिल्कुल अलग था। उनका बेटा इस्माल वहीं उनके सामने खड़ा था। अल्लाह ने इब्राहिम की निष्ठा को देखते हुए उनके बेटे को बकरे की कुर्बानी में बदल दिया।
इब्राहिम की कुर्बानी देखकर अल्लाह खुश हो गये और उन्होंने उसे पैगंबर बना दिया। इतिहास में इस घटना के बाद से ही बकरे की कुर्बानी की परंपरा चली आ रही है।
हालांकि, इस परंपरा में बकरे की कुर्बानी के बाद गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है, उसमें से एक हिस्सा गरीबों को बांटा जाता है... दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों के लिए रखा जाता है और तीसरा हिस्सा अपने घर लिए रखा जाता है।
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